Shiv Chalisa Lyrics: शिव चालीसा अर्थ सहित हिंदी में…

Shiv Chalisa Arth: अगर आप शिव चालीसा का पाठ करना चाहते हैं तो यहां पर हम आपको शिव चालीसा का पाठ हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत करते हैं। यहां आप शिव चालीसा की सभी चौपाइयों का अर्थ जान सकते हैं।

Shiv Chalisa Arth in Hindi

Shiv Chalisa Lyrics in Hindi: हिंदू धर्म में शिव चालीसा का बहुत अधिक महत्व होता है। जो भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक प्रतिदिन शिव चालीसा का पाठ करता है। भगवान शिव उसके जीवन से सभी कष्ट, भय और बाधाएं दूर कर देते हैं। इसके साथ ही उस व्यक्ति को शांति, समृद्धि और संतोष प्राप्त होता है और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है। शिव चालीसा के रचयिता ‘अयोध्या दास’ (Ayodhya Das) माने जाते हैं, जो एक परम शिवभक्त कवि थे। कई संस्करणों में “अयोध्यादास” को तुलसीदास का शिष्य भी माना जाता है। शिव चालीसा में भगवान शिव (Bhagwan Shiv) की महिमा का वर्णन चालीस चौपाइयों के माध्यम से विस्तार से किया गया है। शिव चालीसा एक अत्यंत प्रभावशाली भक्ति ग्रंथ है, जो भगवान शिव की महिमा का स्मरण कराते हुए भक्त के जीवन में शांति, साहस और शक्ति का संचार करता है।

॥ दोहा आरंभ ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्या दास तुम, देहु अभय वरदान॥

अर्थ: हे भगवान गणेश! माता पार्वती के पुत्र, सब मंगलों के मूल और बुद्धिमान प्रभु! अयोध्यादास (लेखक) आपसे प्रार्थना करते हैं कि हमें निर्भयता और आशीर्वाद दीजिए।

॥ चौपाई ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

अर्थ: हे पार्वतीपति (गिरिजापति) महादेव! आप दीन-दुखियों पर दया करने वाले हैं और सदा भक्तों व संतों का पालन करते हैं।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

अर्थ: आपके मस्तक पर सुन्दर चन्द्रमा शोभित है और कानों में सर्प के फन जैसे कुण्डल सुशोभित हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥

अर्थ: आपका शरीर गौरवर्ण (गौर यानी गोरा) है, सिर पर पवित्र गंगा बह रही है। आपके गले में मुण्डमाला है और तन पर भस्म (राख) लगी हुई है।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥

अर्थ: आपने बाघ की खाल को वस्त्र के रूप में धारण किया है। आपकी अद्भुत छवि देखकर सर्प भी मोहित हो जाते हैं।

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

अर्थ: आपकी अर्धांगिनी माता पार्वती (मैना की पुत्री) हैं, जो आपके बाएं भाग में अत्यंत सुन्दर लगती हैं।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

अर्थ: आपके हाथ में त्रिशूल अत्यंत सुशोभित है, जो आपके भक्तों के शत्रुओं का विनाश करने वाला है।

नन्दि गणेश सोहै तहं कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

अर्थ: नंदी और गणेश आपके समीप ऐसे शोभित होते हैं, जैसे समुद्र में कमल सुंदर लगते हैं।

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

अर्थ: आपके साथ कार्तिकेय, गणेश और गणराज शोभित हैं। इस दिव्य दृश्य का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

अर्थ: जब देवता संकट में फंसते हैं और आपकी शरण में आते हैं, तो आप तुरंत उनके सभी दुःख दूर करते हैं।

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

अर्थ: जब तारकासुर नामक दैत्य ने बड़ा उत्पात मचाया, तब सब देवता मिलकर आपकी शरण में आए।

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महं मारि गिरायउ॥

अर्थ: आपने तुरंत षडानन (कार्तिकेय) को भेजा, उन्होंने पलक झपकते ही तारकासुर का वध कर दिया।

आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

अर्थ: आपने जलंधर नामक असुर का भी संहार किया। आपकी यह कीर्ति पूरे संसार में प्रसिद्ध है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

अर्थ: जब त्रिपुरासुर ने उत्पात मचाया, आपने युद्ध किया और सब देवताओं की रक्षा करके कृपा की।

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

अर्थ: जब भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तप किया, तब आपने अपनी प्रतिज्ञा निभाई और गंगा को सिर पर धारण किया।

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

अर्थ: दानियों में आपसे बड़ा कोई नहीं, आपके भक्त सदा आपकी स्तुति करते हैं।

वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

अर्थ: वेदों ने आपकी महिमा का गान किया है, परंतु आपकी वास्तविकता का कोई भी भेद नहीं पा सका, क्योंकि आप अनादि हैं।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥

अर्थ: जब समुद्र मंथन में विष निकला, तो सभी देवता और दैत्य जलने लगे।

कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

अर्थ: आपने दया करके वह विष पी लिया और तबसे आपका नाम नीलकण्ठ (नीले कंठ वाले) पड़ा।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

अर्थ: जब भगवान राम ने आपका पूजन किया, तब उन्होंने लंका पर विजय प्राप्त की और विभीषण को राज्य दिया।

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

अर्थ: जब भगवान विष्णु ने सहस्र कमलों से आपकी पूजा की, तो आपने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥

अर्थ: जब एक कमल कम पड़ गया, तो भगवान विष्णु ने अपने नेत्र (कमलनयन) अर्पित करने का निश्चय किया।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

अर्थ: उनकी कठिन भक्ति देखकर आप अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छित वरदान दिया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

अर्थ: जय हो, जय हो, हे अनन्त और अविनाशी प्रभु! आप सबके हृदय में निवास करते हुए सब पर कृपा करते हैं।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

अर्थ: हे प्रभु! दुष्ट लोग मुझे सदा सताते रहते हैं। मैं भटकती रहती हूँ, मुझे कहीं शांति नहीं मिलती।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

अर्थ: हे प्रभु! मैं “त्राहि त्राहि” कहकर आपको पुकारती हूं, अब इस कठिन समय में मुझे बचाइए।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

अर्थ: आप अपने त्रिशूल से मेरे शत्रुओं का नाश करें और मुझे संकट से बाहर निकालें।

मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

अर्थ: माता-पिता और भाई सब होते हुए भी, संकट में कोई सहायता नहीं करता।

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥

अर्थ: हे प्रभु! अब तो एक आप ही मेरे सहारे हैं,आइए और मेरे भारी संकटों को हर लीजिए।

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

अर्थ: आप धनवान और निर्धन सभी को समान रूप से देते हैं, जो भी आपकी परीक्षा लेता है, वह फल पाता है।

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

अर्थ: हे प्रभु! आपकी स्तुति कैसे करूं? मेरी भूलों को क्षमा करें।

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

अर्थ: हे शंकर! आप सभी संकटों के नाशक हैं, आप मंगल के कारण और विघ्नों के विनाशक हैं।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥

अर्थ: योगी, यति और मुनि आपका ध्यान लगाते हैं, माता सरस्वती और नारद भी आपको प्रणाम करते हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

अर्थ: आपको बार-बार नमस्कार – नमः शिवाय! देवता, ब्रह्मा आदि भी आपकी महिमा का पार नहीं पा सकते।

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥

अर्थ: जो व्यक्ति इस शिव चालीसा का ध्यानपूर्वक पाठ करता है, उस पर भगवान शंकर सदा कृपा करते हैं।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥

अर्थ: जो कोई ऋण में फंसा हो, यदि वह यह चालीसा पढ़े, तो उसके सारे ऋण दूर हो जाते हैं।

पुत्र हीन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

अर्थ: जो संतानहीन व्यक्ति संतान की इच्छा करता है, उसे निश्चय ही शिवजी की कृपा से संतान प्राप्त होती है।

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥

अर्थ: यदि कोई व्यक्ति किसी पंडित को लेकर त्रयोदशी के दिन, ध्यानपूर्वक हवन कराए, तो उसे शुभ फल मिलता है।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

अर्थ: जो व्यक्ति मास की त्रयोदशी तिथि को व्रत करता है, उसके शरीर में कोई पीड़ा या कष्ट नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

अर्थ: जो व्यक्ति धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करके शंकरजी के समक्ष यह चालीसा सुनता है,

जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

अर्थ: उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वह शिवलोक को प्राप्त करता है।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

अर्थ: अयोध्यादास कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे आपसे यही आशा है कि आप मेरे सारे दुःख हर लें।

॥ दोहा समापन॥

नित नेम कर प्रातः ही, पाठ करौ चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

अर्थ: जो व्यक्ति प्रतिदिन नियमपूर्वक प्रातःकाल इस शिव चालीसा का पाठ करता है, हे प्रभु शिव! आप उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें। हेमन्त ऋतु में मार्गशीर्ष (मगसर) मास की छठी तिथि को, संवत 64 में इस शिव चालीसा की रचना पूर्ण हुई, जो कल्याणकारी है।

ये भी पढ़ें – हनुमान चालीसा अर्थ सहित हिंदी में…

Leave a Comment

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Scroll to Top