Guru Pradosh Vrat Katha: बृहस्पतिवार त्रयोदशी (गुरु प्रदोष) व्रत कथा

Guru Pradosh Vrat: अगर आप गुरु प्रदोष व्रत रखते हैं और भगवान शिव को भगवान विष्णु प्रसन्न करना चाहते हैं तो आप गुरु प्रदोष व्रत की यह कथा अवश्य पढ़ें या सुनें, क्योंकि इस कथा के बिना गुरु प्रदोष व्रत की पूजा अधूरी मानी जाती है।

Guru Pradosh Vrat Katha

Guru Pradosh Vrat Katha in Hindi: प्रदोष व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। जब यह तिथि गुरुवार को आती है, तो इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। गुरुवार त्रयोदशी का व्रत ज्ञान, धर्म, संतान-सुख और सम्मान प्राप्त कराने वाला माना जाता है। गुरु ग्रह जीवन में मार्गदर्शन, आशीर्वाद और नैतिक शक्ति का प्रतीक है। इस व्रत को करने से व्यक्ति को उत्तम गुरु, उत्तम विचार और सही दिशा प्राप्त होती है। संतान से जुड़े कष्ट दूर होते हैं और छात्रों को शिक्षा में सफलता मिलती है। पारिवारिक संबंधों में सौहार्द आता है और समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है। भाग्य मजबूत होता है और जीवन की दिशा सकारात्मक रूप से बदलती है। जो लोग जीवन में स्थिरता, सम्मान और संतान-सुख की कामना रखते हैं उनके लिए यह व्रत अत्यंत शुभ है।

बृहस्पतिवार त्रयोदशी (गुरु प्रदोष) व्रत कथा

शत्रु विनाशक भक्ति प्रिय, व्रत है यह अति श्रेष्ठ। बार मास तिथि सब से भी, है यह व्रत अति जेष्ठ॥

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार इन्द्र और वृत्रासुर में घनघोर युद्ध हुआ। उस समय देवताओं ने दैत्य सेना पराजित कर नष्ट-भ्रष्ट कर दी। अपना विनाश देख वृत्रासुर अत्यंत क्रोधित हो स्वयं युद्ध के लिये उद्यत हुआ। मायावी आसुर ने ने आसुरी माया से भयंकर विकराल रूप धारण किया। उसके स्वरूप को देख इन्द्रादिक सब देवताओं ने इन्द्र के परामर्श से परम गुरु बृहस्पति जी का आवाह्न किया, गुरु तत्काल आकर कहने लगे- हे देवेन्द्र! अब तुम वृत्रासुर की कथा ध्यान मग्न होकर सुनो – वृत्रासुर प्रथम बड़ा तपस्वी कर्मनिष्ठ था, इसने गन्धमादन पर्वत पर उग्र तप करके भगवान शिवजी को प्रसन्न किया था। पूर्व समय में यह चित्ररथ नाम का राजा था, तुम्हारे समीपस्थ जो सुरम्य वन है वह इसी का राज्य था, अब साधु प्रवृत्ति विचारवान् महात्मा उस वन में आनन्द लेते हैं। भगवान के दर्शन की अनुपम भूमि है।

एक समय चित्ररथ स्वेच्छा से कैलाश पर्वत पर चला गया। भगवान का स्वरूप और वाम अंग में जगदम्बा को विराजमान देख चित्ररथ हंसा और हाथ जोड़कर शिव शंकर से बोला- हे प्रभो! हम माया मोहित हो विषयों में फंसे रहने के कारण स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं किन्तु देव लोक में ऐसा कहीं दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि कोई स्त्री सहित सभा में बैठे। चित्ररथ के ये वचन सुनकर सर्वव्यापी भगवान शिव हंसकर बोले कि हे राजन् ! मेरा व्यवहारिक दृष्टिकोण पृथक है। मैंने मृत्युदाता काल कूट महाविष का पान किया है। फिर भी तुम साधारण जनों की भांति मेरी हंसी उड़ाते हो।

तभी माता पार्वती क्रोधित होकर चित्ररथ की ओर देखती हुई कहने लगी- ओ दुष्ट तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ ही मेरी हंसी उड़ाई है, तुझे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ेगा। उपस्थित सभासद महान विशुद्ध प्रकृति के शास्त्र तत्वान्वेषी हैं, और सनक सनन्दन सनत्कुमार हैं, ये सर्व अज्ञान के नष्ट हो जाने पर शिव भक्ति में तत्पर हैं, अरे मूर्खराज ! तू अति चतुर है। अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के मजाक का दुःसाहस ही न करेगा। अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, तुझे मैं शाप देती हूं कि अभी पृथ्वी पर चला जा।

जब जगदम्बा भवानी ने चित्ररथ को ये श्राप दिया तो वह तत्क्षण विमान से गिरकर, राक्षस योनि को प्राप्त हो गया और प्रख्यात महासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। तवष्टा नामक ऋषि ने उसे श्रेष्ठ तप से उत्पन्न किया और अब वही वृत्रासुर शिव भक्ति में ब्रह्मचर्य से रहा। इस कारण तुम उसे जीत नहीं सकते, अतएव मेरे परामर्श से यह प्रदोष व्रत करो जिससे महाबलशाली दैत्य पर विजय प्राप्त कर सको। गुरुदेव के वचनों को सुनकर सब देवता प्रसन्न हुए और गुरुवार त्रयोदशी (प्रदोष) व्रत को विधि विधान से किया।

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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