Apara Ekadashi के दिन पूजा के समय अवश्य सुनें ये व्रत कथा, सभी पापों से मिलेगी मुक्ति!

Apara Ekadashi Vrat: अगर आप अपरा एकादशी का व्रत रख हैं तो आप पूजा के समय व्रत कथा अवश्य सुनें, क्योंकि इस व्रत कथा के सुनने से जीवन के सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में खुशहाली बनी रहती है।

Apara Ekadashi Vrat Katha

Apara Ekadashi Vrat Katha: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों में अपरा एकादशी का स्थान अत्यंत शुभ और पुण्यदायक माना जाता है। यह व्रत भगवान भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत करने तथा कथा सुनने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। अपरा एकादशी की कथा धर्म, भक्ति, करुणा और मोक्ष का संदेश देती है।

यह कथा बताती है कि यदि कोई व्यक्ति अनजाने में भी पाप कर बैठता है या कठिन परिस्थितियों में फंस जाता है, तो भगवान की भक्ति, व्रत और पुण्य कर्मों के प्रभाव से उसे मुक्ति मिल सकती है। इस कथा में एक धर्मात्मा राजा, उसके अधर्मी भाई और एक महान ऋषि की करुणा का वर्णन मिलता है, जो अपरा एकादशी व्रत की महिमा को उजागर करता है। आइए, अब श्रद्धा और भक्ति के साथ अपरा एकादशी की पावन कथा का श्रवण करते हैं।

अपरा एकादशी का महत्व | Apara Ekadashi Ka Mahatva

पद्म पुराण के अनुसार, युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि हे जनार्दन! ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी किस नाम से जानी जाती है? कृपया उसके महत्व के बारे में बतलाइए।

भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! तुमने समस्त लोकों के कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी है और बड़े से बड़े पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। जो व्यक्ति गंभीर पापों से ग्रस्त हो, जैसे ब्रह्म हत्या, गोत्र हत्या, गर्भस्थ शिशु की हत्या, परनिंदा या परस्त्रीगमन जैसे दोषों में लिप्त हो, वह भी यदि श्रद्धा और नियमपूर्वक अपरा एकादशी का व्रत करता है तो पापों से मुक्त हो सकता है।

जो लोग झूठी गवाही देते हैं, माप-तौल में छल करते हैं, बिना ज्ञान के ज्योतिष का दिखावा करते हैं या छल-कपट से वैद्य बनकर लोगों को भ्रमित करते हैं, वे भी इस व्रत के प्रभाव से पापमुक्त हो सकते हैं। यदि कोई क्षत्रिय अपने धर्म का त्याग कर युद्धभूमि से भाग जाता है, तो वह घोर नरक का भागी बनता है। इसी प्रकार जो शिष्य विद्या प्राप्त करने के बाद अपने गुरु की निंदा करता है, वह भी महापाप का भागी होता है, लेकिन अपरा एकादशी का व्रत ऐसे लोगों को भी सद्गति प्रदान करता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस व्रत का फल अत्यंत महान है। माघ मास में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर प्रयाग में स्नान करने से जो पुण्य मिलता है, काशी में शिवरात्रि व्रत करने से जो फल प्राप्त होता है, गया में पिंडदान करने से जो पुण्य मिलता है, और बृहस्पति के सिंह राशि में होने पर गोदावरी स्नान से जो लाभ होता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से प्राप्त होता है।

इसके अतिरिक्त बद्रीनाथ और केदारनाथ के दर्शन, सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में यज्ञ तथा हाथी, घोड़ा और स्वर्ण दान करने से जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य अपरा एकादशी के व्रत से भी प्राप्त होता है। जो व्यक्ति अपरा एकादशी का उपवास रखकर भगवान वामन की पूजा करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है। इस व्रत की कथा को पढ़ने या सुनने मात्र से लोगों को सहस्र गौदान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

अपरा एकादशी व्रत कथा | Apara Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर ने विनम्रता से कहा कि हे जनार्दन! आपने अपरा एकादशी का महान महत्व बताया। अब कृपया इसकी कथा भी सुनाइए, जिससे मैं और समस्त लोग इसके वास्तविक फल को समझ सकें।” तब भगवान श्रीकृष्ण बोले कि हे राजन! प्राचीन समय में एक बहुत ही धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा था, जिसका नाम महीध्वज था। वह अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करता था। उसके राज्य में सभी लोग सुखी और संतुष्ट रहते थे। राजा सदैव धर्म के मार्ग पर चलता था, सत्य बोलता था और दीन-दुखियों की सहायता करता था।

लेकिन उसका छोटा भाई वज्रध्वज स्वभाव से बिल्कुल विपरीत था। वह अत्यंत क्रूर, अधर्मी और अन्यायी था। उसके मन में अपने बड़े भाई के प्रति ईर्ष्या और द्वेष भरा हुआ था। वह सोचता था कि राज्य का अधिकार उसे मिलना चाहिए था। यही ईर्ष्या धीरे-धीरे इतनी बढ़ गई कि उसने अपने भाई को रास्ते से हटाने का भयानक निर्णय ले लिया। एक रात जब पूरा राज्य गहरी नींद में सो रहा था, तब वज्रध्वज ने छलपूर्वक अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी। उसने किसी को इस घटना का पता न चलने देने के लिए राजा के शरीर को जंगल में ले जाकर एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया।

राजा महीध्वज धर्मात्मा थे, लेकिन उनकी मृत्यु अकाल और अत्यंत दुखद परिस्थितियों में हुई थी। इसी कारण उनकी आत्मा को शांति नहीं मिली और वे प्रेत योनि में भटकने लगे। उनकी प्रेतात्मा उसी पीपल के वृक्ष पर रहने लगी। दुख और अशांति के कारण वह आसपास के क्षेत्र में अनेक प्रकार के उत्पात करने लगी। वहां से गुजरने वाले लोग भयभीत हो जाते थे। कुछ समय बाद एक दिन महान तपस्वी धौम्य ऋषि उस मार्ग से होकर निकले। अपने दिव्य तपोबल से उन्होंने उस प्रेतात्मा को देखा और तुरंत उसके पूर्व जन्म तथा उसके कष्ट का कारण जान लिया।

ऋषि धौम्य अत्यंत दयालु थे। उन्होंने उस प्रेतात्मा को पीपल के वृक्ष से नीचे उतारा और उसे परलोक तथा मोक्ष का ज्ञान दिया। उन्होंने समझाया कि मुक्ति पाने का मार्ग केवल भगवान की भक्ति और पुण्य कर्मों से ही संभव है। राजा की दुर्दशा देखकर ऋषि का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने निश्चय किया कि वे उस दुखी आत्मा को प्रेत योनि से मुक्त कराएंगे। इसके लिए उन्होंने श्रद्धापूर्वक अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया। उन्होंने पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की, उपवास रखा और रात्रि जागरण किया। व्रत पूर्ण होने पर उन्होंने उस व्रत से प्राप्त समस्त पुण्य राजा महीध्वज की प्रेतात्मा को समर्पित कर दिया।

अपरा एकादशी के उस महान पुण्य के प्रभाव से तुरंत चमत्कार हुआ। राजा महीध्वज की प्रेत योनि समाप्त हो गई। उन्हें दिव्य और तेजस्वी शरीर प्राप्त हुआ। वे अत्यंत प्रसन्न होकर ऋषि धौम्य को धन्यवाद देने लगे। उसी समय स्वर्ग से एक सुंदर पुष्पक विमान आया। राजा उस विमान में बैठकर स्वर्ग लोक को प्रस्थान कर गए। जाते-जाते उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया और कहा कि आपके उपकार से मुझे मुक्ति प्राप्त हुई।

भगवान श्रीकृष्ण ने कथा समाप्त करते हुए युधिष्ठिर से कहा कि हे राजन! मैंने यह अपरा एकादशी की कथा लोक कल्याण के लिए कही है। जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से इस कथा को पढ़ता या सुनता है, वह अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और अंत में उत्तम गति को प्राप्त करता है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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