Yogini Ekadashi Vrat Katha: सनातन धर्म में योगिनी एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार इस पवित्र एकादशी का व्रत और इसकी कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त करने का एक श्रेष्ठ साधन माना गया है। यदि आप योगिनी एकादशी का व्रत कर रहे हैं या भगवान विष्णु की पूजा कर रहे हैं, तो पूरे श्रद्धा और एकाग्र मन से इस पावन कथा को अवश्य सुनें या पढ़ें। इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।
योगिनी एकादशी व्रत कथा
एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रतापूर्वक पूछा कि “हे जनार्दन! आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसकी महिमा क्या है और इस व्रत की कथा क्या है? कृपया मुझे विस्तार से बताइए।” तब भगवान श्रीकृष्ण बोले कि “हे राजन्! यह एकादशी ‘योगिनी एकादशी’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह समस्त पापों का नाश करने वाली, रोगों का विनाश करने वाली तथा भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य अनेक जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। अब मैं तुम्हें इसकी पवित्र कथा सुनाता हूं, जिसे पूर्वकाल में महर्षि मार्कण्डेय ने बताया था।”
प्राचीन काल में हिमालय के समीप अलकापुरी नामक दिव्य नगरी थी। वहां धन के अधिपति भगवान कुबेर राज्य करते थे। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और प्रतिदिन अत्यंत श्रद्धा एवं विधि-विधान से उनकी पूजा किया करते थे। कुबेर की सेवा में हेममाली नाम का एक यक्ष नियुक्त था। उसका दैनिक कार्य था कि वह प्रातःकाल मानसरोवर से सुगंधित और ताज़े पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर प्रस्तुत करे। हेममाली अपनी सेवा बड़ी निष्ठा से करता था।
हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था। वह अत्यंत सुंदर, पतिव्रता और गुणवती थी। हेममाली अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करता था। एक दिन वह पुष्प लेकर अपने घर पहुंचा तो पत्नी के प्रेम और स्नेह में ऐसा मग्न हो गया कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। वह भगवान शिव की पूजा के लिए पुष्प कुबेर के पास पहुंचाना भूल गया। उधर पूजा का समय बीतने लगा। कुबेर भगवान शिव की आराधना के लिए पुष्पों की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब बहुत देर हो गई तो उन्होंने अपने सेवकों को हेममाली को बुलाने के लिए भेजा।
सेवकों ने लौटकर बताया कि महाराज! हेममाली अपनी पत्नी के साथ घर में आनंदपूर्वक समय बिता रहा है और आपके लिए पुष्प लेकर नहीं आया। यह सुनकर कुबेर अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने तुरंत हेममाली को अपने सामने बुलवाया। भयभीत हेममाली दरबार में उपस्थित हुआ। कुबेर ने कठोर स्वर में कहा कि दुष्ट! तूने भगवान शिव की सेवा की उपेक्षा की है। अपने कर्तव्य को त्यागकर सांसारिक मोह में डूब गया। ऐसी भूल क्षमायोग्य नहीं है। इसलिए मैं तुझे शाप देता हूं कि तू इसी क्षण कुष्ठ रोग से पीड़ित हो जाएगा। तेरा सुंदर शरीर नष्ट हो जाएगा, तू अपनी पत्नी से वियोग को प्राप्त होगा और पृथ्वी पर दुःख भोगता हुआ भटकेगा।
कुबेर का शाप तत्काल प्रभावी हुआ। हेममाली का शरीर कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया। उसका तेज समाप्त हो गया और उसे अलकापुरी से निकाल दिया गया। पत्नी से बिछुड़कर वह वन-वन भटकने लगा। भूख, प्यास, धूप, वर्षा और असहनीय पीड़ा से उसका जीवन अत्यंत दुखमय हो गया। यद्यपि वह अपने कर्मों का फल भोग रहा था, फिर भी उसके हृदय में भगवान के प्रति श्रद्धा बनी रही। अनेक वर्षों तक कष्ट सहने के बाद एक दिन वह महान तपस्वी महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा।
हेममाली ने दूर से ही ऋषि को प्रणाम किया। महर्षि ने अपनी दिव्य दृष्टि से उसके दुःख का कारण जान लिया और करुणा से भरकर पूछा कि “वत्स! तुम कौन हो? तुम्हारी यह दशा कैसे हुई?” हेममाली ने हाथ जोड़कर अपनी पूरी कहानी सुनाई। उसने स्वीकार किया कि उसने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की थी और उसी अपराध के कारण कुबेर के शाप से यह दुःख प्राप्त हुआ है। अंत में उसने विनती कर कहा कि हे प्रभो! यदि मुझ पर आपकी कृपा हो, तो ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं इस शाप से मुक्त हो सकूं।
महर्षि मार्कण्डेय बोले कि “वत्स! तुम भाग्यशाली हो कि यहां आ गए। अब मैं तुम्हें एक अत्यंत पवित्र और दुर्लभ व्रत बताता हूं। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की ‘योगिनी एकादशी’ का श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक पालन करो। भगवान श्रीहरि विष्णु का पूजन करो, उपवास रखो, रात्रि में जागरण करो और द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे और तुम शाप से मुक्त हो जाओगे।
हेममाली ने महर्षि के वचनों को सत्य मानकर योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। उसने पूर्ण श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा की, उपवास रखा, भजन-कीर्तन किया और द्वादशी को विधिपूर्वक पारण किया। व्रत के पुण्य प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग तत्काल समाप्त हो गया। उसका शरीर पहले की भांति सुंदर, तेजस्वी और दिव्य हो गया। वह सभी पापों और शाप से मुक्त होकर पुनः अलकापुरी पहुंचा। कुबेर ने भी उसे क्षमा कर दिया और उसकी सेवा पुनः स्वीकार कर ली। हेममाली अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा और अंत में भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त हुआ।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि हे राजन्! योगिनी एकादशी का व्रत महान पुण्यदायक है। इसके प्रभाव से मनुष्य के बड़े से बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत रोग, दरिद्रता, दुःख और संकटों को दूर करता है। कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत करने से अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्राप्त होता है। जो श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करता है, वह इस लोक में सुख और अंत में भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।
“इति श्री योगिनी एकादशी व्रत कथा सम्पूर्णम्।”
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Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक, पौराणिक एवं पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर हो सकता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का पालन करने से पहले योग्य विद्वान या अपने परंपरागत गुरु से सलाह अवश्य लें।




