Shri Ram Chandra Ji Ka Bhajan: श्री राम चंद्र जी की आरती-भजन | श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्।

Shri Ram Chandra Ji Ka Bhajan: “श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन” यह भजन केवल आरती नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और भक्ति आंदोलन का अमूल्य रत्न है। हर रामभक्त के लिए यह आत्मा को छू लेने वाला स्तोत्र है।

Shri Ram Chandra Ji Ka Bhajan

Shri Ram Chandra Ji Ka Bhajan: “श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन” आरती प्रभु राम के नाम, स्वरूप और उनके दिव्य गुणों का गुणगान है। इसे गाने से भक्त को मानसिक शांति, भक्ति की गहराई और जीवन में धर्म पालन की प्रेरणा मिलती है। यह आरती हमें भगवान श्रीराम के कृपालु स्वरूप का स्मरण कराती है। इसमें प्रभु को “भव-भय” (संसार रूपी दुख और जन्म-मरण के भय) का हरण करने वाला बताया गया है। इसे गाकर भक्त प्रभु राम के चरणों में आत्मसमर्पण करते हैं। यह आरती श्रीरामनवमी, नवरात्र, रामायण पाठ और दैनिक पूजा में विशेष महत्व रखती है।

भजन में कहा गया है कि श्रीराम ही वह दिव्य शक्ति हैं जो जीवात्मा को संसार रूपी दुख-सागर से पार लगाते हैं। इसे गाने से मनुष्य को मोक्ष की ओर प्रेरणा मिलती है। रामचंद्र जी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। उनकी आरती/भजन का पाठ करने से भक्त को धर्म, सत्य और सदाचार पर चलने की शक्ति मिलती है। आरती के समय जब दीपक जलाकर यह भजन गाया जाता है तो घर में पवित्र वातावरण बनता है। नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मानसिक शांति मिलती है।

श्री राम चंद्र जी का भजन | Shri Ram Chandra Ji Ka Bhajan

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्।
नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्।।

भावार्थ: हे मन! तू कृपालु श्रीरामचंद्र का भजन कर, जो जन्म-मरण रूपी भय का नाश करने वाले हैं। उनकी आंखें नव-खिले कमल के समान हैं, मुख कमल जैसा सुंदर है, हाथ कमल जैसे कोमल हैं और उनके चरण भी अरुण-कमल के समान शोभायमान हैं।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।

भावार्थ: श्रीराम की छवि अनंत और अनगिनत कामदेवों से भी अधिक मनोहर है। वे नव-खिले नीलकमल जैसे सुंदर हैं। पीताम्बर पहनने से वे मानो बिजली की आभा से सुशोभित दिखाई देते हैं। ऐसे पवित्र रामजी को मैं सीता जी के पति स्वरूप नमन करता हूं।

भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।
रघुनंद आनंद कंद कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।

भावार्थ: हे मन! उस राम का भजन कर, जो दीनों (गरीबों और दुखियों) के बंधु हैं, सूर्यवंश के दीपक हैं, दैत्य और दानव कुल का नाश करने वाले हैं। वे रघुकुल के गौरव, आनंद के स्रोत, कौशल्या के चंद्रमा और राजा दशरथ के पुत्र हैं।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।

भावार्थ: रामजी के सिर पर मुकुट सुशोभित है, कानों में कुण्डल हैं और मस्तक पर तिलक है। उनका शरीर दिव्य आभूषणों से अलंकृत है। उनकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी हैं, वे धनुष-बाण धारण किए हुए हैं और युद्ध में खर-दूषण जैसे राक्षसों को जीत चुके हैं।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।
मम ह्रदय कुंज निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।

भावार्थ: तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचंद्रजी शंकरजी, शेषनाग और समस्त मुनियों के भी मन को आनंदित करते हैं। हे प्रभु! मेरे हृदय रूपी कुंज में आप सदा निवास करें और काम-क्रोधादि दुष्ट गुणों का नाश करें।

मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।
करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।

भावार्थ: जिस मन को जिस भाव में रामजी प्रिय लगते हैं, उसी रूप में वे सहज सुंदर सियाराम मिल जाते हैं। वे करुणा के भंडार हैं, सुजान हैं और अपने भक्तों का प्रेम भली-भांति जानते हैं।

एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।
तुलसी भवानी पूजि पूनी पूनी मुदित मन मंदिर चली।।

भावार्थ: इस प्रकार जब सीता जी ने माता गौरी का आशीर्वाद सुना, तो उनके हृदय में अत्यंत हर्ष हुआ। तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता जी बार-बार भवानी की पूजा करके प्रसन्न मन से मंदिर से बाहर चलीं।

दोहा | Doha

जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।। 

भावार्थ: जब माता सीता ने देखा कि गौरी माता उनके अनुकूल हैं, तो उनके हृदय में अपार हर्ष हुआ, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मंगल का मूल कारण उनके हृदय में उत्पन्न हुआ और उनके बाएं अंग (जैसे आँख या हाथ) शुभ संकेत के रूप में फड़कने लगे।

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