Bhagavad Gita Adhyay 1: भगवद् गीता अध्याय 1 ~ अर्जुन विषाद योग

Bhagavad Gita Arjun Vishad Yog: कुरुक्षेत्र के मैदान में सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन मोह और अवसाद से घिर जाते हैं और युद्ध करने से मना कर देते हैं।

Bhagavad Gita Adhyay 1

Bhagavad Gita Adhyay 1: भगवद् गीता अध्याय 1 ~ अर्जुन विषाद योग

श्लोक 1

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१॥

हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे (धृतराष्ट्र के) पुत्र और पाण्डु के पुत्र-दोनों पक्ष- जब वहां इकट्ठे हुए, तो उन्होंने क्या किया? अर्थात धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि पवित्र भूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए जुटी हुई दोनों सेनाओं ने युद्ध आरम्भ होने से पहले क्या स्थिति बनाई या क्या कार्य किया।

श्लोक 2

सञ्जय उवाच।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२॥

संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को युद्ध के लिए सुव्यवस्थित व्यूह में खड़ी देखकर अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर ये वचन कहे। अर्थात् धृतराष्ट्र के प्रश्न का उत्तर देते हुए संजय युद्धभूमि का दृश्य बताते हैं। दुर्योधन जब पाण्डवों की विशाल और सुगठित सेना को देखता है, तो उसके मन में चिंता उत्पन्न होती है। इसलिए वह अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर अपनी बात कहता है। यहाँ दुर्योधन की मानसिक स्थिति का संकेत मिलता है कि वह पाण्डवों की शक्ति को देखकर पूरी तरह निश्चिंत नहीं था।

श्लोक 3

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३॥

हे आचार्य! पाण्डु-पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न ने बड़ी कुशलता से व्यूहबद्ध किया है। अर्थात् दुर्योधन द्रोणाचार्य का ध्यान पाण्डव सेना की ओर आकर्षित करता है। वह विशेष रूप से यह बताता है कि इस सेना की व्यवस्था धृष्टद्युम्न ने की है, जो द्रोणाचार्य का शिष्य था। दुर्योधन के शब्दों में एक प्रकार का व्यंग्य और संकेत छिपा है कि आपके ही शिष्य ने आज आपके विरुद्ध सेना का नेतृत्व संभाला है।

श्लोक 4

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४॥

इस सेना में अनेक शूरवीर और महान धनुर्धर हैं, जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान पराक्रमी हैं; जैसे सात्यकि (युयुधान), विराट तथा महारथी द्रुपद। अर्थात् दुर्योधन पाण्डव सेना के प्रमुख योद्धाओं का उल्लेख करता है। वह स्वीकार करता है कि पाण्डव पक्ष में अनेक बलशाली और युद्ध-कुशल महारथी उपस्थित हैं। इससे उसकी चिंता और सावधानी दोनों प्रकट होती हैं।

श्लोक 5

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५॥

धृष्टकेतु, चेकितान, पराक्रमी काशीराज, पुरुजित, कुन्तिभोज तथा पुरुषों में श्रेष्ठ राजा शैब्य भी इस सेना में उपस्थित हैं। अर्थात् दुर्योधन पाण्डव पक्ष के अन्य प्रमुख योद्धाओं का वर्णन करता है। वह दिखाना चाहता है कि पाण्डवों की सेना केवल भीम और अर्जुन पर निर्भर नहीं है, बल्कि उसमें अनेक बलशाली और प्रतिष्ठित राजा भी सम्मिलित हैं।

श्लोक 6

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥

पराक्रमी युधामन्यु, वीर्यवान उत्तमौजा, सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं। अर्थात् दुर्योधन आगे पाण्डव पक्ष के उन योद्धाओं का उल्लेख करता है जो युद्धकला में अत्यन्त निपुण थे। विशेष रूप से अभिमन्यु का नाम उल्लेखनीय है, जो अल्पायु होते हुए भी अद्वितीय वीर था।

श्लोक 7

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥७॥

हे द्विजश्रेष्ठ (द्रोणाचार्य)! अब हमारी सेना के प्रमुख योद्धाओं को भी जान लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मैं उनका परिचय देता हूं। अर्थात् पाण्डव सेना का वर्णन करने के बाद दुर्योधन अब अपनी सेना के मुख्य योद्धाओं का परिचय देने लगता है। इससे वह अपने पक्ष की शक्ति का भी स्मरण कराना चाहता है।

श्लोक 8

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥८॥

आप स्वयं (द्रोणाचार्य), पितामह भीष्म, कर्ण, युद्ध में विजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त-पुत्र भूरिश्रवा भी हमारे प्रमुख योद्धा हैं। अर्थात् दुर्योधन अपनी सेना के सबसे महत्वपूर्ण योद्धाओं का नाम लेता है। इनमें भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महावीर सम्मिलित हैं, जिनके बल पर उसे विजय की आशा थी।

श्लोक 9

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९॥

और भी बहुत से शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की है। वे सभी विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित तथा युद्धकला में निपुण हैं। अर्थात् दुर्योधन अपनी सेना के उत्साह और निष्ठा का वर्णन करता है। वह बताता है कि उसके पक्ष में अनेक ऐसे योद्धा हैं जो उसके लिए प्राण देने तक को तैयार हैं।

श्लोक 10

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥१०॥

भीष्म पितामह द्वारा संरक्षित हमारी सेना असीम और अपार है, जबकि भीम द्वारा संरक्षित इनकी सेना सीमित है। अर्थात् दुर्योधन अपनी सेना का उत्साह बढ़ाने के लिए उसके बल को अपार बताता है। यद्यपि कुछ आचार्यों के अनुसार यहाँ उसके मन की चिंता भी झलकती है, क्योंकि वह बार-बार पाण्डव सेना की शक्ति का उल्लेख कर रहा है।

श्लोक 11

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥११॥

अतः आप सब अपने-अपने मोर्चों पर स्थित होकर हर दिशा से पितामह भीष्म की रक्षा करें। अर्थात् दुर्योधन जानता था कि भीष्म उसकी सेना के सबसे महत्वपूर्ण सेनापति हैं। इसलिए वह सभी योद्धाओं को विशेष रूप से उनकी रक्षा करने का आदेश देता है।

श्लोक 12

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान्॥१२॥

दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए कुरुवंश के वृद्ध और प्रतापी पितामह भीष्म ने सिंह के समान गर्जना करके ऊँचे स्वर में अपना शंख बजाया। अर्थात् भीष्म पितामह ने शंखनाद करके कौरव सेना का उत्साह बढ़ाया। यह युद्ध के औपचारिक आरम्भ का संकेत था और सैनिकों में जोश भरने वाला क्षण भी।

श्लोक 13

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥१३॥

इसके बाद शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और रणभेरियां एक साथ बज उठीं। उनका वह शब्द अत्यन्त भयंकर और गूंजपूर्ण हो गया। अर्थात् भीष्म के शंखनाद के बाद सम्पूर्ण कौरव सेना ने युद्ध की घोषणा के रूप में अपने-अपने वाद्ययंत्र बजाए। उस ध्वनि से रणभूमि गूँज उठी और युद्ध का वातावरण पूर्ण रूप से तैयार हो गया।

श्लोक 14

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥१४॥

तत्पश्चात् श्वेत घोड़ों से युक्त महान रथ पर बैठे भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपने दिव्य शंख बजाए। अर्थात् कौरव पक्ष के शंखनाद के उत्तर में श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंखों का नाद किया। यह केवल युद्ध की घोषणा नहीं थी, बल्कि धर्म की ओर से अधर्म को चुनौती भी थी।

श्लोक 15

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥१५॥

हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने पाञ्चजन्य नामक शंख बजाया, धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया और भीषण कर्म करने वाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया। अर्थात् यहां प्रमुख योद्धाओं के शंखों के नाम बताए गए हैं। प्रत्येक शंख का अपना विशेष महत्व और प्रभाव था। विशेषकर भीम का पौण्ड्र शंख अत्यन्त प्रचण्ड ध्वनि वाला माना जाता था।

श्लोक 16

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥१६॥

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए। अर्थात् पाण्डवों के प्रत्येक प्रमुख योद्धा ने अपने शंख बजाकर युद्ध के लिए अपनी तत्परता व्यक्त की। शंखनाद वीरता, आत्मविश्वास और धर्मयुद्ध के संकल्प का प्रतीक था।

श्लोक 17

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥१७॥

श्रेष्ठ धनुर्धर काशीराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट तथा अपराजित सात्यकि भी अपने-अपने शंख बजाने लगे। अर्थात् यह श्लोक पाण्डव पक्ष के अन्य महान योद्धाओं का उल्लेख करता है, जो युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थे।

श्लोक 18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्॥१८॥

हे राजन्! राजा द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र तथा महाबाहु अभिमन्यु—इन सबने भी अलग-अलग अपने शंख बजाए। अर्थात् अब सम्पूर्ण पाण्डव सेना का उत्साह और पराक्रम शंखनाद के माध्यम से प्रकट हो रहा है। यह ध्वनि धर्मपक्ष की दृढ़ता का प्रतीक थी।

श्लोक 19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९॥

उस भयंकर ध्वनि ने आकाश और पृथ्वी को गुंजा दिया तथा धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण कर दिया। अर्थात् पाण्डवों के शंखनाद में आत्मविश्वास, धर्मबल और विजय का संकेत था। उसकी गूंज से कौरव पक्ष के अनेक योद्धाओं के मन में भय और अशुभ आशंका उत्पन्न हुई।

श्लोक 20

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते॥२०॥

हे राजन्! तब कपिध्वज अर्जुन ने युद्ध के लिए तैयार खड़े धृतराष्ट्र के पुत्रों को देखकर और शस्त्र चलने का समय आ जाने पर अपना धनुष उठाकर श्रीकृष्ण से यह वचन कहा। अर्थात् यहीं से अर्जुन के मन में गम्भीर विचार उत्पन्न होने लगते हैं। युद्ध आरम्भ होने ही वाला है, किन्तु अर्जुन पहले दोनों सेनाओं को देखना चाहते हैं। आगे के श्लोकों में यही प्रसंग भगवद्गीता के उपदेश का कारण बनता है।

श्लोक 21

अर्जुन उवाच।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥२१॥

अर्जुन बोले- हे अच्युत (श्रीकृष्ण)! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कीजिए। अर्थात् युद्ध आरम्भ होने ही वाला है। अर्जुन चाहते हैं कि वे युद्धभूमि में उपस्थित योद्धाओं को निकट से देखें। इसलिए वे श्रीकृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलने का अनुरोध करते हैं।

श्लोक 22

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥२२॥

मैं उन युद्ध की इच्छा रखने वाले योद्धाओं को देखना चाहता हूं, जिनके साथ मुझे इस युद्ध में लड़ना है। अर्थात् अर्जुन युद्ध से पहले अपने विरोधियों का निरीक्षण करना चाहते हैं। वे जानना चाहते हैं कि किन-किन लोगों के विरुद्ध उन्हें शस्त्र उठाना पड़ेगा।

श्लोक 23

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं येऽतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥२३॥

मैं उन लोगों को देखना चाहता हूं जो यहां युद्ध करने के लिए एकत्र हुए हैं और जो दुर्बुद्धि दुर्योधन को प्रसन्न करने के उद्देश्य से उसके पक्ष में खड़े हैं। अर्थात् अर्जुन का संकेत उन राजाओं और योद्धाओं की ओर है जिन्होंने दुर्योधन का साथ दिया है। वे यह समझना चाहते हैं कि कौन-कौन लोग अधर्म का समर्थन कर रहे हैं।

श्लोक 24

सञ्जय उवाच।
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥२४॥

संजय बोले- हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)! अर्जुन द्वारा ऐसा कहे जाने पर श्रीकृष्ण ने श्रेष्ठ रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर दिया। अर्थात् श्रीकृष्ण अर्जुन की इच्छा का सम्मान करते हैं और रथ को ऐसी जगह ले जाते हैं जहां से दोनों पक्षों के प्रमुख योद्धा स्पष्ट दिखाई दें।

श्लोक 25

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति॥२५॥

भीष्म, द्रोण और अन्य राजाओं के सामने रथ खड़ा करके श्रीकृष्ण ने कहा- हे पार्थ! इन एकत्र हुए कुरुओं को देखो। अर्थात् श्रीकृष्ण जानबूझकर रथ को भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे पूजनीय व्यक्तियों के सामने खड़ा करते हैं। यही दृश्य अर्जुन के हृदय में करुणा और मोह उत्पन्न करने वाला बनता है।

श्लोक 26

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥२६॥

अर्जुन ने दोनों सेनाओं में अपने पितरों, पितामहों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों तथा मित्रों को युद्ध के लिए खड़ा देखा। अर्थात् जब अर्जुन ने युद्धभूमि में अपने ही परिवार के बड़े-बुज़ुर्गों, गुरुओं, रिश्तेदारों और प्रियजनों को देखा, तो उनका मन विचलित होने लगा। जिन लोगों का वे सम्मान करते थे और जिनके साथ उनका स्नेहपूर्ण संबंध था, उन्हीं के विरुद्ध उन्हें शस्त्र उठाना था। यह दृश्य उनके हृदय को गहराई से व्यथित करने लगा।

श्लोक 27

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥२७॥

उन्होंने दोनों सेनाओं में अपने ससुरों, शुभचिंतकों तथा अन्य सभी संबंधियों को भी युद्ध के लिए खड़ा देखा। उन सभी स्वजनों को इस प्रकार सामने देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन गहरे भाव-विह्वल हो उठे। अर्थात् अर्जुन ने जब देखा कि दोनों ओर उनके अपने ही संबंधी और हितैषी युद्ध के लिए तैयार खड़े हैं, तब उनके मन में करुणा और मोह उत्पन्न हो गया। अब यह युद्ध उन्हें विजय और राज्य प्राप्ति का अवसर नहीं, बल्कि अपने ही कुल के विनाश का कारण दिखाई देने लगा। यही भावना आगे चलकर अर्जुन के विषाद का रूप लेती है और भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश का आधार बनती है।

श्लोक 28

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥२८॥

अत्यन्त करुणा से भरकर और शोकाकुल होकर अर्जुन ने कहा- हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से उपस्थित इन स्वजनों को देखकर। अर्थात् यहीं से अर्जुन का विषाद आरम्भ होता है। उनका वीर हृदय करुणा से भर जाता है और वे मानसिक रूप से विचलित होने लगते हैं।

श्लोक 29

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९॥

मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर कांप रहा है और रोमांच हो रहा है। अर्थात् अर्जुन की मानसिक व्याकुलता अब शारीरिक लक्षणों के रूप में प्रकट होने लगती है। यह गहरे दुःख और तनाव की अवस्था का वर्णन है।

श्लोक 30

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३०॥

मेरा गाण्डीव धनुष हाथ से छूट रहा है, त्वचा जल रही है, मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा हूँ और मेरा मन चक्कर खा रहा है। अर्थात् महान धनुर्धर अर्जुन, जो कभी युद्ध से नहीं डरे, अपने स्वजनों के प्रति मोह और करुणा के कारण अत्यन्त विचलित हो जाते हैं। यही मानसिक संकट आगे श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश का कारण बनता है।

श्लोक 31

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥३१॥

हे केशव! मैं अशुभ लक्षण देख रहा हूं और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर मुझे कोई कल्याण दिखाई नहीं देता। अर्थात् अर्जुन को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि यह युद्ध अनिष्टकारी होगा। अपने ही संबंधियों का वध करके प्राप्त होने वाली विजय उन्हें निरर्थक लगती है।

श्लोक 32

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२॥

हे कृष्ण! मुझे न विजय की इच्छा है, न राज्य की और न ही सुखों की। हे गोविन्द! जब अपने ही लोग न रहें, तो राज्य, भोग और जीवन का क्या प्रयोजन है? अर्थात् अर्जुन का मोह और वैराग्य बढ़ता जा रहा है। वे सोचते हैं कि जिनके लिए राज्य चाहिए, यदि वही न रहें, तो राज्य प्राप्त करने का कोई अर्थ नहीं।

श्लोक 33

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३॥

जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे ही सब अपने प्राणों और धन की परवाह छोड़कर युद्धभूमि में खड़े हैं। अर्थात् अर्जुन बताते हैं कि जिन प्रियजनों के सुख के लिए राज्य की इच्छा की जाती है, वही आज युद्ध में सामने खड़े हैं। इसलिए युद्ध की विजय उन्हें निरर्थक प्रतीत होती है।

श्लोक 34

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥३४॥

यहां गुरुजन, पिता, पुत्र, पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी खड़े हैं। अर्थात् अर्जुन युद्धभूमि में उपस्थित अपने संबंधियों की सूची बताते हैं। इससे उनके हृदय की करुणा और मोह स्पष्ट दिखाई देता है।

श्लोक 35

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५॥

हे मधुसूदन! यदि ये मुझे मार भी डालें, तब भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता; फिर केवल पृथ्वी के राज्य के लिए तो कहना ही क्या, तीनों लोकों का राज्य मिले तब भी नहीं। अर्जुन अपने स्वजनों के प्रति अत्यन्त करुणा व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि समस्त संसार का राज्य भी उनके वध को उचित नहीं ठहरा सकता।

श्लोक 36

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥३६॥

हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी? यद्यपि वे आततायी हैं, फिर भी उन्हें मारने से हमें पाप ही लगेगा। अर्जुन धर्म और करुणा के बीच उलझ गए हैं। वे जानते हैं कि कौरवों ने अनेक अन्याय किए हैं, फिर भी अपने संबंधियों का वध उन्हें पापपूर्ण प्रतीत होता है।

श्लोक 37

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७॥

इसलिए हमें अपने बान्धव धृतराष्ट्र-पुत्रों को नहीं मारना चाहिए। हे माधव! अपने ही स्वजनों को मारकर हम सुखी कैसे रह सकते हैं? अर्जुन का मुख्य तर्क यह है कि अपने ही परिवार का विनाश करके मिलने वाला सुख वास्तविक सुख नहीं हो सकता।

श्लोक 38

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८॥

यद्यपि लोभ से अंधे हुए ये लोग कुल के विनाश और मित्रों के साथ विश्वासघात के दोष को नहीं देखते। अर्थात् अर्जुन मानते हैं कि दुर्योधन और उसके साथी लोभ के कारण धर्म-अधर्म का विवेक खो चुके हैं।

श्लोक 39

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९॥

हे जनार्दन! जब हम कुल-विनाश के दोष को भली-भाँति समझते हैं, तब हमें इस पाप से क्यों नहीं बचना चाहिए? अर्थात् अर्जुन कहते हैं कि जो व्यक्ति किसी कर्म के दुष्परिणाम को जानता हो, उसे उस कर्म से दूर रहना चाहिए।

श्लोक 40

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥४०॥

कुल के नष्ट हो जाने पर उसके सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, और धर्म के नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल में अधर्म फैल जाता है। अर्थात् अर्जुन अब सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से युद्ध के परिणामों पर विचार कर रहे हैं। उनका मत है कि परिवारों के विनाश से धर्म, संस्कार और नैतिक व्यवस्था भी नष्ट हो जाती है।

श्लोक 41

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥४१॥

हे कृष्ण! जब अधर्म बढ़ जाता है, तब कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं और स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर (सामाजिक अव्यवस्था) उत्पन्न होती है। अर्थात् अर्जुन का तर्क है कि युद्ध के कारण परिवारों का विनाश होगा, जिससे सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक मर्यादाएँ कमजोर पड़ जाएँगी। इसके परिणामस्वरूप समाज में अव्यवस्था फैल सकती है।

श्लोक 42

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२॥

वर्णसंकर कुल का नाश करने वालों और उनके कुल- दोनों को नरक की ओर ले जाता है। क्योंकि पिण्डदान और तर्पण आदि क्रियाएँ बंद हो जाने से उनके पितर भी पतित हो जाते हैं। अर्थात् अर्जुन के अनुसार कुलधर्म के नष्ट होने से धार्मिक संस्कार और परम्पराएँ समाप्त हो जाती हैं, जिससे पूर्वजों के प्रति कर्तव्य भी नहीं निभाए जा पाते।

श्लोक 43

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३॥

इन वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले दोषों से कुल के शाश्वत धर्म और सामाजिक कर्तव्य नष्ट हो जाते हैं। अर्थात् अर्जुन समझते हैं कि कुलों के विनाश से पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक और सामाजिक व्यवस्थाएँ समाप्त हो जाएँगी।

श्लोक 44

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥४४॥

हे जनार्दन! जिन मनुष्यों के कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उनके लिए नरकवास निश्चित होता है- ऐसा हमने सुना है। अर्थात् अर्जुन शास्त्रों और परम्पराओं का स्मरण करते हुए कहते हैं कि कुलधर्म का नाश अत्यन्त गंभीर पाप माना गया है।

श्लोक 45

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥४५॥

हाय! हम कितने बड़े पाप को करने के लिए तैयार हो गए हैं कि राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हैं। अर्थात् अर्जुन स्वयं को भी दोषी मानने लगते हैं। उन्हें लगता है कि राज्य की इच्छा ने उन्हें धर्म से विचलित कर दिया है।

श्लोक 46

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६॥

यदि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र युद्धभूमि में निहत्थे और प्रतिकार न करने वाले मुझे मार डालें, तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा। अर्थात् अर्जुन युद्ध करने की अपेक्षा स्वयं मर जाना अधिक उचित समझते हैं। यह उनके विषाद और मोह की चरम अवस्था है।

श्लोक 47

सञ्जय उवाच।
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७॥

संजय बोले- इस प्रकार कहकर अर्जुन युद्धभूमि में बाण सहित अपना धनुष छोड़कर रथ के पिछले भाग में बैठ गए। उनका मन शोक से अत्यन्त व्याकुल हो उठा था।

प्रथम अध्याय का समापन अर्जुन के विषाद के साथ होता है। महान योद्धा अर्जुन मोह और करुणा से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि युद्ध करने की इच्छा छोड़ देते हैं। इसी स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण उन्हें दिव्य ज्ञान देने वाले हैं, जो आगे द्वितीय अध्याय – सांख्ययोग से प्रारम्भ होता है।

॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥

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