Shri Ganesh Chalisa Arth in Hindi: श्री गणेश चालीसा भगवान गणेश को समर्पित एक स्तुति है, जिसका पाठ करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। इसमें गणेश जी के रूप, लीला और महिमा का वर्णन है, जैसे वे ‘सदगुण सदन’, ‘विघ्न हरण’ और ‘गिरिजालाल’ हैं, जिनके एक दंत, हाथी-मुख, पुस्तक और मोदक प्रिय हैं और जिनकी बुद्धि-परीक्षा में पृथ्वी परिक्रमा से जीत हासिल की थी, जिससे उन्हें प्रथम पूज्य का वरदान मिला। आइए विस्तार से जानें श्री गणेश चालीसा अर्थ सहित हिन्दी में…
श्री गणेश चालीसा – पूर्ण अर्थ सहित
॥ दोहा ॥
जय गणपति सद्गुण सदन, करि वर वदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
अर्थ: हे गणपति! आप सभी सद्गुणों के निवास स्थान हैं। आप सुंदर मुख वाले और अत्यंत कृपालु हैं। आप सभी विघ्नों का नाश कर मंगल करने वाले हैं। माता गिरिजा (पार्वती) के पुत्र गणेश जी की बार-बार जय हो।
जय जय जय गणपति गणराजू, मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता, विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
अर्थ: हे गणों के राजा गणपति! आपकी बार-बार जय हो। आप सभी के जीवन में मंगल भरने वाले और शुभ कार्यों को सफल करने वाले हैं। आप हाथी के मुख वाले, सुख देने वाले, संपूर्ण विश्व के स्वामी और बुद्धि प्रदान करने वाले हैं।
वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन, तिलक त्रिपुण्ड भाल मनभावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला, स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
अर्थ: आपकी सूँड सुंदर रूप से मुड़ी हुई है। आपके मस्तक पर त्रिपुण्ड तिलक शोभा देता है। आपके गले में रत्न और मोतियों की माला है, सिर पर स्वर्ण मुकुट है और आपके नेत्र विशाल हैं।
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं, मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित, चरण पादुका मुनि मन राजित॥
अर्थ: आपके हाथों में शास्त्र, कुल्हाड़ी और त्रिशूल हैं। आपको मोदक और सुगंधित फूल प्रिय हैं। आपने सुंदर पीत वस्त्र धारण किए हैं और आपके चरणों की पादुकाएँ ऋषि-मुनियों के मन को आनंद देती हैं।
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता, गौरी ललन विश्व विख्याता॥
ऋद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे, मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
अर्थ: आप धन्य हैं, क्योंकि आप भगवान शिव के पुत्र और कार्तिकेय के भाई हैं। आप माता गौरी के लाड़ले और संसार में प्रसिद्ध हैं। ऋद्धि-सिद्धि आपकी सेवा करती हैं और आपका वाहन मूषक द्वार पर शोभायमान रहता है।
कहां जन्म शुभ कथा तुम्हारी, अति शुचि पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी, पुत्र हेतु तप कीन्हों भारी॥
अर्थ: आपके जन्म की कथा अत्यंत पवित्र और मंगलकारी है। एक समय पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तप किया।
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा, तब पहुंच्यो तम धरि द्विज रूपा॥
अतिथि जानि के गौरी सुखारी, बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥
अर्थ: जब माता पार्वती का यज्ञ पूर्ण हुआ, तब भगवान शिव ब्राह्मण का रूप धारण कर वहाँ पहुँचे। उन्हें अतिथि समझकर पार्वती जी ने हर्षपूर्वक उनकी सेवा की।
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा, मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहिं पुत्र तुहि बुद्धि विशाला, बिना गर्भ धारण यहि काला॥
अर्थ: सेवा से प्रसन्न होकर शिव जी ने वरदान दिया कि तुम्हें अत्यंत बुद्धिमान पुत्र प्राप्त होगा, और वह बिना गर्भ धारण किए प्रकट होगा।
गणनायक गुण ज्ञान निधाना, पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्धान रूप है, पलना पर बालक स्वरूप है॥
अर्थ: शिव जी ने कहा कि यह बालक गुणों और ज्ञान का भंडार होगा और सबसे पहले पूजित होगा। इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए और पालने में बालक गणेश प्रकट हुए।
बनि शिशु रूदन जबहिं तुम बना, लखि मुख-सुख नहिं गौरी समाना॥
सकल भुवन मुख मंगल गावहिं, नभ ते सुरन सुमन वर्षावहि॥
अर्थ: जब आप शिशु रूप में रोने लगे, तो आपके मुख को देखकर गौरी जी अत्यंत प्रसन्न हुईं। समस्त संसार मंगल गीत गाने लगा और देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की।
शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं, सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा, देखन भी आए शनि राजा॥
अर्थ: शिव और पार्वती दान देने लगे। देवता और ऋषि बालक को देखने आए। सब ओर आनंद का वातावरण था। शनि देव भी दर्शन के लिए आए।
निज अवगुण गुनि शनि मनमाहीं, बालक देखन चाहत नाहिं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो, उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥
अर्थ: शनि देव अपने दोष को जानते थे, इसलिए बालक को देखने से बचना चाहते थे। परंतु पार्वती जी को लगा कि शनि उत्सव में रुचि नहीं ले रहे हैं।
कहने लगे शनि मन सकुचाई, का करिहां शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास उमा कर भयऊ, शनि सों बालक देखन काऊ॥
अर्थ: शनि देव संकोच से बोले कि बालक को देखना उचित नहीं है, पर पार्वती जी ने विश्वास न किया और उन्हें देखने के लिए कहा।
पड़तर्हि शनि हग कोण प्रकाशा, बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
गिरिजा गिरी विकल है धरणी, सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥
अर्थ: जैसे ही शनि की दृष्टि पड़ी, बालक का सिर कटकर आकाश में उड़ गया। पार्वती जी पृथ्वी पर गिर पड़ीं और उनका दुख वर्णन से परे था।
हाहाकार मच्यो कैलाशा, शनि कीन्हों लखि सुत का नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये, काटि चक्र सो गजशिर लाये॥
अर्थ: कैलाश में हाहाकार मच गया। तब भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और चक्र से हाथी का सिर लाकर दिए।
बालक के धड़ ऊपर धारयो, प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम ‘गणेश’ शम्भु तब कीन्हें, प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हें॥
अर्थ: हाथी का सिर बालक के धड़ पर जोड़ा गया और शिव जी ने प्राण मंत्र से उसे जीवित किया। उसका नाम गणेश रखा और उसे प्रथम पूज्य होने का वर दिया।
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा, पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन मरमि भुलाई, रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई॥
अर्थ: शिव जी ने बुद्धि की परीक्षा ली और पृथ्वी की परिक्रमा का आदेश दिया। कार्तिकेय निकल पड़े, पर गणेश जी ने बुद्धि से उपाय सोचा।
चरण मातु पितु के धर लीन्हें, तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे, नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
अर्थ: गणेश जी ने माता-पिता की सात बार परिक्रमा की। शिव जी यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और देवताओं ने पुष्पवर्षा की।
तुम्हारी महिमा बुद्धि बड़ाई, शेष सहस मुख सके न गाई॥
मैं मतिहीना मलीन दुखारी, करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
अर्थ: आपकी महिमा और बुद्धि का वर्णन हजार मुखों वाला शेषनाग भी नहीं कर सकता। मैं तो अल्पबुद्धि और दुखी हूँ, आपकी स्तुति कैसे करूँ?
भजत राम सुन्दर प्रभु दासा, लग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजे, अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजे॥
अर्थ: कवि स्वयं को प्रभु राम का दास बताकर गणेश जी से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, इस दीन पर कृपा करें और मुझे भक्ति व शक्ति प्रदान करें।
॥ दोहा ॥
श्रीगणेश यह चालीसा पाठ करै धर ध्यान, नित नव मंगल गृह यसै लहै जगत सनमान॥
सम्बन्ध अपन सहस्व दश, ऋषि पंचमी दिनेश, पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥
अर्थ: जो कोई भी इस चालीसा का ध्यानपूर्वक पाठ करता है, उसके घर में हमेशा शुभता, मंगल और संसार में सम्मान आता है, और यह चालीसा ऋषि पंचमी के दिन (या ‘सहस्र दश’ – दस हज़ार) पाठ करने से पूर्ण होती है, जिससे मंगल मूर्ति गणेश प्रसन्न होते हैं।


