Karva Chauth Vrat Niyam: भारत की सांस्कृतिक परंपरा में व्रत और त्योहारों का विशेष महत्व है। हर व्रत केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं होता, बल्कि उसमें परिवार और समाज को जोड़ने का संदेश भी छिपा होता है। ऐसा ही पर्व है करवा चौथ, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन की मधुरता के लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने व्रत का पारण करती हैं। करवा चौथ का महत्व जितना धार्मिक है, उतना ही भावनात्मक और सामाजिक भी है। इस लेख में हम जानेंगे करवा चौथ की परंपरा, धार्मिक मान्यता, व्रत के दौरान क्या करें और क्या नहीं करें, और इसके पीछे छिपे महत्व को विस्तार से।
करवा चौथ हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है। इसे “करक चतुर्थी” भी कहा जाता है। शास्त्रों में इसका महत्व इस प्रकार बताया गया है। यह व्रत सौभाग्यवती स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु प्रदान करता है। मान्यता है कि इस व्रत से दांपत्य जीवन में प्रेम, एकता और विश्वास की वृद्धि होती है। करवा चौथ का संबंध केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार के सुख-शांति और समृद्धि से जुड़ा माना जाता है।
करवा चौथ की परंपरा और कथा
करवा चौथ के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक सबसे प्रसिद्ध कथा महाभारत काल से जुड़ी है। पांडवों के वनवास के दौरान द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण से पति की सुरक्षा और मंगल की कामना के लिए कोई उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को करवा चौथ व्रत करने का उपदेश दिया। इस व्रत के प्रभाव से पांडव संकटों से सुरक्षित रहे।
दूसरी कथा में बताया गया है कि एक स्त्री ने अपने पति के प्राण बचाने के लिए इस व्रत को किया और अपनी आस्था से यमराज तक को झुका लिया। इसी कारण इसे अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु का व्रत कहा जाता है।
करवा चौथ की पूजा-विधि
करवा चौथ का व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें विशेष पूजा-विधि का महत्व भी है।
- सूर्योदय से पहले सरगी: व्रत रखने वाली महिला सूर्योदय से पहले सास या परिवार की बड़ों से सरगी (फल, मिठाई, सूखे मेवे, पराठा आदि) खाती है। इसके बाद दिनभर निर्जला उपवास करती है।
- शाम की पूजा: संध्या समय महिलाएं श्रृंगार कर लाल, गुलाबी या पीले वस्त्र पहनकर पूजा करती हैं। वे अपने हाथों में करवा (जल से भरा पात्र) रखती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं।
- करवा का महत्व: करवा जल और मिट्टी का पात्र होता है, जिसे विशेष रूप से इस व्रत में प्रयोग किया जाता है। इसे पूजा के समय माता पार्वती और भगवान शिव के प्रतीक स्वरूप माना जाता है।
- चंद्रमा को अर्घ्य: रात को जब चंद्रमा निकलता है, तो महिलाएं छलनी से चंद्रमा को देखकर फिर पति के दर्शन करती हैं। इसके बाद पति के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत का पारण करती हैं।
करवा चौथ पर क्या करें
- सूर्योदय से पहले उठें: व्रत रखने वाली महिला को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और शुद्ध होकर सरगी ग्रहण करनी चाहिए।
- श्रृंगार और लाल वस्त्र: करवा चौथ के दिन महिलाएँ सोलह श्रृंगार करती हैं। इसमें बिंदी, चूड़ी, मेंहदी, सिंदूर और मंगलसूत्र विशेष रूप से शामिल हैं।
- भक्ति भाव से कथा सुनें: पूजा के समय करवा चौथ व्रत कथा सुनना आवश्यक है। इससे व्रत पूर्ण होता है।
- पति की दीर्घायु के लिए प्रार्थना: व्रत का मुख्य उद्देश्य पति की लंबी उम्र और स्वास्थ्य है, इसलिए प्रार्थना में यही भाव होना चाहिए।
- दान-पुण्य करें: व्रत के दिन ब्राह्मणों, कन्याओं या जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करना शुभ फलदायक माना गया है।
- चंद्रमा को अर्घ्य दें: रात को चंद्रमा को दूध या जल से अर्घ्य देकर व्रत खोलना जरूरी है।
करवा चौथ पर क्या न करें
- खाना-पीना: दिनभर उपवास के दौरान जल और अन्न का सेवन न करें। यह व्रत निर्जला ही रखना चाहिए।
- झगड़ा या क्रोध: व्रत के दिन क्रोध करना, वाणी से कटु बोल बोलना या विवाद करना अशुभ माना गया है।
- काले या सफेद वस्त्र पहनना: इस दिन शुभ रंगों (लाल, पीला, गुलाबी) का ही प्रयोग करें। काले और सफेद रंग को अशुभ माना जाता है।
- अशुद्ध रहना: व्रत के दौरान स्नान, पूजा और शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।
- कथा और पूजा बिना व्रत तोड़ना: करवा चौथ व्रत तभी पूर्ण होता है जब कथा सुनी जाए और चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति के हाथ से जल ग्रहण किया जाए।
- नकारात्मक विचार: इस दिन मन को शांत रखें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
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आधुनिक समय में करवा चौथ का महत्व
आज के समय में करवा चौथ केवल पारंपरिक व्रत नहीं रह गया है, बल्कि यह पति-पत्नी के रिश्ते की मजबूती और आपसी प्रेम का प्रतीक बन चुका है। अब पति भी पत्नियों के साथ व्रत रखते हैं ताकि रिश्ते में समानता और सम्मान का भाव प्रकट हो। शहरी जीवन में व्यस्तता के बावजूद लोग इस दिन को बड़े उत्साह और श्रद्धा से मनाते हैं। कई परिवारों में महिलाएं सामूहिक रूप से करवा चौथ की पूजा करती हैं, जिससे सामाजिक एकता भी बढ़ती है।
जानें क्या है धार्मिक मान्यता
करवा चौथ का पर्व केवल धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट संबंध और परिवार की समृद्धि का उत्सव है। इस दिन किए गए नियम, संयम और पूजा केवल परंपरा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे रिश्तों में प्रेम और विश्वास को और गहरा करते हैं। सही विधि से करवा चौथ का व्रत करने से न केवल पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि मिलती है, बल्कि दांपत्य जीवन में स्थिरता, सौहार्द और आनंद भी बना रहता है। इसीलिए यह पर्व आज भी पूरे उत्साह और आस्था के साथ भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे भारतीय परिवारों में भी बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।



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