Sharad Purnima Ka Rahasya: हिन्दू धर्म में आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को आने वाली शरद पूर्णिमा को सबसे पवित्र रात माना गया है। ये वह रात होती है जब चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं (16 Kalas) से परिपूर्ण होकर धरती पर अपनी अमृतमयी चांदनी बरसाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों में औषधीय गुण होते हैं, जो तन और मन दोनों को स्वस्थ रखते हैं। धार्मिक मान्यता हो या वैज्ञानिक दृष्टि, शरद पूर्णिमा का पर्व दोनों ही रूपों में अत्यंत महत्व रखता है। इस रात को कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानें क्यों यह पूर्णिमा इतनी खास होती है और चंद्रमा की 16 कलाओं का रहस्य क्या है।
हिंदू धर्म में हर पूर्णिमा तिथि विशेष मानी जाती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का स्थान सबसे ऊंचा है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजभूमि में गोपियों के साथ महारास रचाया था, जो प्रेम, भक्ति और दिव्यता का अद्भुत संगम था। इस दिन मां लक्ष्मी की भी विशेष पूजा की जाती है। कहा जाता है कि रात्रि में जो व्यक्ति जागरण करता है, उस पर मां लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसती है।
‘कोजागरी’ शब्द का अर्थ ही है कि ‘कौन जाग रहा है?’ मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी आकाश से घूमती हुई धरती पर आती हैं और जो व्यक्ति उस समय जागकर उनका ध्यान करता है, उसे धन, वैभव और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
चंद्रमा की 16 कलाओं का रहस्य
- हिंदू शास्त्रों के अनुसार, चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त होता है। इन कलाओं को जीवन, बुद्धि, सौंदर्य और शांति के प्रतीक के रूप में माना गया है। हर कला एक गुण या शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। जैसे कि सौम्यता, प्रेम, करुणा, बुद्धि, स्मृति, संयम, वाणी और ध्यान।
- शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं के साथ प्रकट होता है, जबकि अमावस्या के दिन ये कलाएं पूर्णतः लुप्त रहती हैं। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं सोलह कलाओं से पूर्ण अवतार थे, इसलिए शरद पूर्णिमा को उनके “पूर्णत्व” का प्रतीक भी माना जाता है। इन 16 कलाओं का रहस्य यह है कि ये मानव जीवन के संपूर्ण विकास का प्रतीक हैं।
- पांच इंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां, पांच प्राण और एक आत्मा, ये सब मिलकर सोलह होते हैं। शरद पूर्णिमा का चंद्रमा इन्हीं सोलह तत्वों के संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन की रात होती है अद्भुत
शरद ऋतु के आगमन के साथ यह पूर्णिमा मौसम के सबसे सुंदर परिवर्तन का सूचक होती है। इस दिन आकाश स्वच्छ, हवा शीतल और चांदनी अत्यंत उज्जवल होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस रात चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है, जिससे उसकी किरणें अधिक प्रभावशाली हो जाती हैं। इन किरणों में यूवी (Ultra Violet) और अन्य औषधीय तत्व होते हैं, जो शरीर के लिए लाभदायक हैं। इस कारण से भारतीय परंपरा में इस रात खीर बनाकर खुले आकाश में रखी जाती है, ताकि उसमें चंद्रमा की किरणों का स्पर्श हो सके। कहा जाता है कि यह खीर अमृत के समान गुणकारी होती है और कई रोगों से रक्षा करती है।
खीर और चंद्र अमृत का संबंध
शरद पूर्णिमा की रात को दूध और चावल से बनी खीर बनाना एक प्राचीन परंपरा है। इसका वैज्ञानिक कारण भी है कि शरद ऋतु में मौसम बदलता है और शरीर को ठंडक व पोषण दोनों की आवश्यकता होती है। दूध और चावल का संयोजन कैल्शियम, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का उत्तम स्रोत है। जब खीर को खुले आकाश में रखा जाता है, तो चंद्रमा की शीतल किरणों में लैक्टोज और स्टार्च का संयोजन एक तरह का रासायनिक संतुलन बनाता है। इसी कारण कहा जाता है कि चांदनी में रखी खीर का सेवन अमृत के समान लाभकारी होता है।
मां लक्ष्मी और कोजागरी व्रत की परंपरा
शरद पूर्णिमा की रात को मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। लोग अपने घरों को दीपक और पुष्पों से सजाते हैं। माना जाता है कि इस रात जो व्यक्ति लक्ष्मीजी की आराधना करता है, उसके जीवन में कभी धन का अभाव नहीं होता। बहुत से घरों में कोजागरी व्रत भी रखा जाता है। व्रतधारी व्यक्ति इस रात जागकर “ओं श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का जप करता है और लक्ष्मी पूजन के बाद खीर का भोग लगाता है। कहा जाता है कि लक्ष्मीजी उस व्यक्ति के घर में स्थायी रूप से निवास करती हैं जो इस रात मन, वचन और कर्म से पवित्र रहता है।
आयुर्वेद और स्वास्थ्य दृष्टि से महत्व
आयुर्वेद के अनुसार, शरद पूर्णिमा का चंद्रप्रकाश शरीर के लिए औषधि के समान है। यह शरीर की पित्त और वात दोष को संतुलित करता है। इसी कारण इस दिन चांदनी में बैठना और उसकी रोशनी का स्पर्श लेना अत्यंत लाभकारी माना गया है। चंद्रमा की किरणों से शरीर को शीतलता मिलती है, मानसिक तनाव कम होता है और नींद गहरी आती है। आयुर्वेद कहता है कि शरद पूर्णिमा का चांद मनोविकारों और अनिद्रा जैसी समस्याओं के लिए प्राकृतिक औषधि का कार्य करता है।
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लोक परंपराएं और सांस्कृतिक रंग
भारत के विभिन्न हिस्सों में शरद पूर्णिमा को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। कहीं इसे कोजागरी पूर्णिमा, कहीं रास पूर्णिमा, तो कहीं कमल पूर्णिमा कहा जाता है। बंगाल में यह दिन मां लक्ष्मी की पूजा के रूप में प्रसिद्ध है, जबकि ब्रज में इसे रास लीला महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गुजरात, राजस्थान और मध्य भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं और अपने परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।
कई जगहों पर इस अवसर पर भजन-संध्या, कथा और जागरण का आयोजन होता है।
चंद्रमा और मन का गहरा संबंध
चंद्रमा का सीधा संबंध मन और भावनाओं से बताया गया है। ज्योतिष में चंद्र को ‘मन का कारक ग्रह’ कहा गया है। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को ध्यान और साधना का विशेष महत्व बताया गया है। जो व्यक्ति इस रात चंद्रमा की चांदनी में ध्यान करता है, उसे आंतरिक शांति, स्थिरता और मानसिक ऊर्जा प्राप्त होती है। यह ध्यान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मिक विकास का मार्ग माना गया है।
शरद पूर्णिमा और भगवान कृष्ण का संबंध
पुराणों में वर्णन मिलता है कि शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन की गोपियों के साथ महारास रचाया था। यह केवल प्रेम का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक था। कहा जाता है कि उस रात चंद्रमा की शीतल रोशनी में सम्पूर्ण ब्रजभूमि जगमगा उठी थी और स्वयं चंद्रदेव ने इस रास लीला को देखने के लिए अपने प्रकाश को और बढ़ा दिया था। इसलिए शरद पूर्णिमा को “रास पूर्णिमा” भी कहा जाता है।
चंद्र अमृत से भरी एक दिव्य रात
शरद पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, विज्ञान और प्रकृति का अद्भुत संगम है। यह रात हमें यह सिखाती है कि जैसे चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अपनी शीतलता सभी पर समान रूप से बरसाता है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन को संपूर्णता और करुणा से भरना चाहिए। इस रात की चांदनी हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति में हर चीज का अपना संतुलन और उद्देश्य है। बस हमें उसे पहचानना है। इसलिए शरद पूर्णिमा केवल चांद को निहारने की रात नहीं, बल्कि मन, तन और आत्मा को शुद्ध करने का पर्व है।
जो इस रात श्रद्धा और सादगी से लक्ष्मी पूजा करता है, चंद्रमा की रोशनी में खीर का प्रसाद ग्रहण करता है, और प्रेम भाव से जागरण करता है। उसके जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का चंद्रमा कभी अस्त नहीं होता है।


