Mangal Pradosh Vrat Katha in Hindi: प्रदोष व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। जब यह तिथि मंगलवार को आती है, तो इसे मंगल प्रदोष व्रत कहा जाता है। मंगलवार त्रयोदशी का व्रत शक्ति, साहस और बाधा-निवारण का शुभ फल देता है। मंगल ग्रह शौर्य, संघर्ष, रक्त और शत्रुओं का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए इस दिन किया गया प्रदोष व्रत व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों से उबारता है। कोर्ट-कचहरी के मामले, शत्रु-भय, दुर्घटना की आशंका और रक्त संबंधी रोगों से राहत मिलती है। यह व्रत ऋण-मुक्ति, साहस में वृद्धि और आत्मविश्वास प्रदान करता है। जो लोग जीवन में संघर्षों से जूझ रहे हैं, उनके लिए मंगल-प्रदोष अत्यंत प्रभावी माना गया है। भगवान शिव कृपा से व्यक्ति के भीतर नई ऊर्जा जागृत होती है और कठिनाइयां धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं।
मंगलवार त्रयोदशी (मंगल प्रदोष) व्रत कथा
शौनकादि ऋषि सूत जी से बोले कि कृपा करके अब आप मंगल प्रदोष व्रत की कथा का वर्णन कीजिएगा। फिर सूत जी बोले कि अब मैं मंगल त्रयोदशी प्रदोष व्रत का विधि विधान कहता हूं। मंगलवार का दिन व्याधियों का नाशक है। इस व्रत में एक समय व्रती को गेहूं और गुड़ का भोजन करना चाहिए। देव प्रतिमा पर लाल रंग का फूल चढ़ाना और स्वयं लाल वस्त्र धारण करना चाहिए। इस व्रत के करने से मनुष्य सभी पापों व रोगों से मुक्त हो जाता है इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है। अब मैं आपको उस बुढ़िया की कथा सुनाता हूं जिसने यह व्रत किया व मोक्ष को प्राप्त हुई।
अत्यन्त प्राचीन काल की घटना है। एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। उसके मंगलिया नाम का एक पुत्र था। वृद्धा को हनुमान जी पर बड़ी श्रद्धा थी। वह प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी का व्रत रखकर यथाविधि उनका भोग लगाती थी। इसके अलावा मंगलवार को न तो घर लीपती थी और न ही मिट्टी खोदती थी। इसी प्रकार से व्रत रखते हुए जब उसे काफी दिन बीत गए तो हनुमान जी ने सोचा कि चलो आज इस वृद्धा की श्रद्धा की परीक्षा करें। वे साधु का वेष बनाकर उसके द्वार पर जा पहुंचे और पुकारा ” है कोई हनुमान का भक्त जो हमारी इच्छा पूरी करे।” वृद्धा ने यह पुकार सुनी तो बाहर आई और पूछा कि महाराज क्या आज्ञा है ?
साधु वेषधारी हनुमान जी बोले कि ‘मैं बहुत भूखा हूं भोजन करूंगा। तू थोड़ी सी जमीन लीप दे।’ वृद्धा बड़ी दुविधा में पड़ गई। अन्त में हाथ जोड़कर प्रार्थना की। हे महाराज ! लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त जो काम आप कहें वह मैं करने को तैयार हूं। साधु ने तीन बार परीक्षा कराने के बाद कहा कि तू अपने बेटे को बुला उसे औंधा लिटाकर, उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा। वृद्धा ने सुना तो पैरों तले की धरती खिसक गई, मगर वह वचन हार चुकी थी। उसने मंगलिया को पुकार कर साधु महाराज के हवाले कर दिया। मगर साधु ऐसे ही मानने वाले न थे। उन्होंने वृद्धा के हाथों से ही मंगलिया को ओंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलवाई। आग जलाकर, दुःखी मन से वृद्धा अपने घर के अन्दर जा घुसी।
साधु जब भोजन बना चुका तो उसने वृद्धा को बुला कर कहा कि वह मंगलिया को पुकारे ताकि वह भी आकर भोग लगा ले। वृद्धा आंखों में आंसू भरकर कहने लगी कि अब उसका नाम लेकर मेरे हृदय को और न दुःखाओ, लेकिन साधु महाराज न माने तो वृद्धा को भोजन के लिए मंगलिया को पुकारना पड़ा। पुकारने की देर थी कि मंगलिया बाहर से हंसता हुआ घर में दौड़ा आया। मंगलिया को जीता जागता देखकर वृद्धा को सुखद आश्चर्य हुआ। वह साधु महाराज के चरणों में गिर पड़ी। साधु महाराज ने उसे अपने असली रूप के दर्शन दिए। हनुमान जी को अपने आंगन में देखकर वृद्धा को लगा कि जीवन सफल हो गया। मंगल (भौम) प्रदोष व्रत की कथा सम्पन्न हुई।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।


