Shani Pradosh Vrat Katha: शनिवार त्रयोदशी (शनि प्रदोष) व्रत कथा

Shani Pradosh Vrat: अगर आप शनि प्रदोष व्रत रखते हैं और भगवान शिव और शनिदेव को प्रसन्न करना चाहते हैं तो आप शनि प्रदोष व्रत की यह कथा अवश्य पढ़ें या सुनें, क्योंकि इस कथा के बिना शनि प्रदोष व्रत की पूजा अधूरी मानी जाती है।

Shani Pradosh Vrat Katha

Shani Pradosh Vrat Katha in Hindi: प्रदोष व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। जब यह तिथि शनिवार को आती है, तो इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। शनिवार त्रयोदशी का व्रत शनि-दोष को शांत कर जीवन के कष्टों को कम करने वाला माना गया है। शनि ग्रह कर्म, न्याय और जीवन की परीक्षाओं का प्रतीक है। इस दिन प्रदोष व्रत करने से साढ़ेसाती, ढैया या शनि-संबंधित परेशानियां कम होती हैं। आर्थिक संकट, नौकरी की अस्थिरता, व्यापार की रुकावटें और स्वास्थ्य संबंधी कष्ट दूर होते हैं। व्यक्ति के जीवन में धैर्य, स्थिरता और सकारात्मकता बढ़ती है। यह व्रत उन लोगों के लिए अत्यंत शुभ है जिनके जीवन में संघर्ष या बार-बार बाधाएँ आती हैं। भगवान शिव कृपा से व्यक्ति को न्याय और सफलता प्राप्त होने लगती है।

शनिवार त्रयोदशी (शनि प्रदोष) व्रत कथा

सूत जी से गर्गाचार्य जी ने कहा कि हे महामते! आपने शिव शंकर प्रसन्नता हेतु समस्त प्रदोष व्रतों का वर्णन किया अब हम शनि प्रदोष विधि सुनने की इच्छा रखते हैं, सो कृपा करके सुनाइये। तब सूत जी बोले- हे ऋषि ! निश्चयात्मक रूप से आपका शिव-पार्वती के चरणों में अत्यन्त प्रेम है, मैं आपको शनि त्रयोदशी के व्रत की विधि बतलाता हूं, सो ध्यान से सुनें। पुरातन कथा है कि एक निर्धन ब्राह्मण की स्त्री दरिद्रता से दुःखी हो शांडिल्य ऋषि के पास जाकर बोली कि हे महामुने! मैं अत्यन्त दुःखी हूं, दुःख निवारण का उपाय बतलाइये। मेरे दोनों पुत्र आपकी शरण में हैं। मेरे ज्येष्ठ पुत्र का नाम धर्म है जो कि राजपुत्र है और लघु पुत्र का नाम शुचिव्रत है अतः हम दरिद्री हैं, आप ही हमारा उद्धार कर सकते हैं, इतनी बात सुन ऋषि ने शिव प्रदोष व्रत करने के लिए कहा।

तीनों प्राणी प्रदोष व्रत करने लगे। कुछ समय पश्चात् प्रदोष व्रत आया तब तीनों ने व्रत का संकल्प लिया। छोटा लड़का जिसका नाम शुचिव्रत था एक तालाब पर स्नान करने को गया तो उसे मार्ग में स्वर्ण कलश धन से भरपूर मिला, उसको लेकर वह घर आया, प्रसन्न हो माता से कहा कि मां! यह धन मार्ग से प्राप्त हुआ है, माता ने धन देखकर शिव महिमा का वर्णन किया। राजपुत्र को अपने पास बुलाकर बोली देखो पुत्र, यह धन हमें शिवजी की कृपा से प्राप्त हुआ है। अतः प्रसाद के रूप में दोनों पुत्र आधा-आधा बांट लो, माता का वचन सुन राजपुत्र ने शिव-पार्वती का ध्यान किया और बोला कि पूज्य यह धन आपके पुत्र का ही है मैं इसका अधिकारी नहीं हूं। मुझे शंकर भगवान और माता पार्वती जब देंगे तब लूंगा। इतना कहकर वह राजपुत्र शंकर जी की पूजा में लग गया।

एक दिन दोनों भाईयों का प्रदेश भ्रमण का विचार हुआ, वहां उन्होंने अनेक गन्धर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा, उन्हें देख शुचिव्रत ने कहा कि भैया अब हमें इससे आगे नहीं जाना है, इतना कह शुचिव्रत उसी स्थान पर बैठ गया, परन्तु राजपुत्र अकेला ही स्त्रियों के बीच में जा पहुंचा। वहां एक स्त्री अति सुन्दरी राजकुमार को देख मोहित हो गई और राजपुत्र के पास पहुंचकर कहने लगी कि हे सखियों! इस वन के समीप ही जो दूसरा वन है तुम वहां जाकर देखो भांति-भांति के पुष्प खिले हैं, बड़ा सुहावना समय है, उसकी शोभा देखकर आओ, मैं यहां बैठी हूं, मेरे पैर में बहुत पीड़ा है। ये सुन सब सखियां दूसरे वन में चली गयीं। वह अकेली सुन्दर राजकुमार की ओर देखती रही।

इधर राजकुमार भी कामुक दृष्टि से निहारने लगा, युवती बोली कि आप कहां रहते हैं? वन में कैसे पधारे? किस राजा के पुत्र हैं? क्या नाम है? राजकुमार बोला कि मैं विदर्भ नरेश का पुत्र हूं, आप अपना परिचय दें। युवती बोली- मैं बिद्रविक नामक गन्धर्व की पुत्री हूं, मेरा नाम अंशुमति है मैंने आपकी मनःस्थिति को जान लिया है कि आप मुझ पर मोहित हैं, विधाता ने हमारा तुम्हारा संयोग मिलाया है। युवती ने मोतियों का हार राजकुमार के गले में डाल दिया। राजकुमार हार स्वीकार करते हुए बोला कि हे भद्रे! मैंने आपका प्रेमोपहार स्वीकार कर लिया है, परन्तु मैं निर्धन हूं।

राजकुमार के इन वचनों को सुनकर गन्धर्व कन्या बोली कि मैं जैसा कह चुकी हूं वैसा ही करूंगी, अब आप अपने घर जाएं। इतना कहकर वह गन्धर्व कन्या सखियों से जा मिली। घर जाकर राजकुमार ने शुचिव्रत को सारा वृतांत कह सुनाया। जब तीसरा दिन आया वह राजपुत्र शुचिव्रत को लेकर उसी वन में जा पहुंचा, वही गन्धर्व राज अपनी कन्या को लेकर आ पहुंचा। इन दोनों राजकुमारों को देख आसन दे कहा कि मैं कैलाश पर गया था वहां शंकर जी ने मुझसे कहा कि धर्मगुप्त नाम का राजपुत्र है जो इस समय राज्य विहीन निर्धन है, मेरा परम भक्त है, हे गन्धर्व राज! तुम उसकी सहायता करो।

मैं महादेव जी की आज्ञा से इस कन्या को आपके पास लाया हूं। आप इसका निर्वाह करें, मैं आपकी सहायता कर आपको राजगद्दी पर बिठा दूंगा। इस प्रकार गन्धर्व राज ने कन्या का विधिवत विवाह कर दिया। विशेष धन और सुन्दर गन्धर्व कन्या को पाकर राजपुत्र अति प्रसन्न हुआ। भगवत कृपा से वह समयोपरान्त अपने शत्रुओं को दमन करके राज्य का सुख भोगने लगा। यहीं शनि प्रदोष व्रत की कथा संपन्न हुई।

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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