श्री पाशुपत व्रत कथा | Shri Pashupat Vrat Katha in Hindi

Shri Pashupat Vrat: श्री पाशुपत व्रत कठिन तपस्या और मोक्ष और शिव तत्व को प्राप्त करने के लिए किया जाता है, यह व्रत अधिक कठोर है, इसमें साधक को पशु-भाव त्यागकर शिवत्व प्राप्त करने का प्रयास करना पड़ता है।

Shri Pashupat Vrat Katha

Shri Pashupat Vrat Katha: श्री पाशुपत व्रत भगवान भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और पुण्यदायी व्रत माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से पापों के नाश, इच्छाओं की पूर्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए किया जाता है। इसका संबंध पाशुपत संप्रदाय और शिव के “पशुपति” रूप से है। अगर आप श्री पाशुपत व्रत करने जा रहे हैं तो पूजा के समय ये व्रत कथा अवश्य सुनें। इस व्रत कथा के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।

श्री पाशुपत व्रत कथा

ऋषि बोले-हे भगवन्! हम परम उत्तम पाशुपत व्रत को सुनने की इच्छा करते हैं, जिसे करके ब्रह्मा आदि देवता भी पाशुपत हो गये। वायु बोले-समस्त पापों को दूर करने वाला रहस्य मैं आपसे वर्णन करता हूँ, यह गोपनीय पाशुपत व्रत अथर्वशिरस् उपनिषद् में प्रसिद्ध है। काल इसका चित्रा से युक्त पूर्णमासी, शिव स्वीकृत देश, क्षेत्र, आराम (बगीचा) श्रेष्ठ लक्षण युक्त इसमें कहा है। उसमें पहले त्रयोदशी के दिन स्नानादि करके, अग्नि होम के उपरान्त और अपने आचार्य की पूजा के उपरान्त, प्रणाम करके उनसे आज्ञा ले। विशेष पूजा करके स्वयं सफेद वस्त्र धारण करके, शुक्ल यज्ञोपवीत, श्वेत माला, श्वेत चन्दन धारण करके कुशासन पर बैठकर मुट्ठी में कुशों को लेकर उत्तर वा पूर्व को मुख करके तीन प्राणायाम करके देवी और देव को विज्ञापन किये मार्ग से ध्यान करके ‘मैं दीक्षित होकर यह व्रत करता हूं’।

यह संकल्प करें, जब तक शरीरपात हो अथवा बारह वर्ष तक, छः वर्ष, तीन वर्ष अथवा बारह मास तक, छः, तीन अथवा एक ही महीने बारह दिन अथवा छः दिन, तीन दिन व एक ही दिन के व्रत का संकल्प करके, विरजाहोम के निमित्त विधि पूर्वक अग्नि को लेकर घी, समिधा और चरु से यथायोग्य हवन करके पूर्ण आहुति के उपरान्त फिर तत्त्वों की शुद्धि के उद्देश्य से उन समिधा आदि का मूल मन्त्र (पंचाक्षर) से हवन करें और यह तत्त्व मेरे देह के शुद्ध हों, ऐसा स्मरण करता जाय, पंचभूत तन्मात्रा पंच कर्मेन्द्रिय ज्ञान और कर्म के भेद से इनके पांच-पांच विभाग हैं, त्वचादि सात धातु प्राणादि वायु, मन, बुद्धि, अहंकार, गुण, प्रकृति, पुरुष, राग, विद्या, कला, नियति, काल माया, शुद्ध विद्या, महेश्वर, सदाशिव, शक्ति और शिवतत्त्व यह क्रम से तत्त्व कहे हैं। इन विरजा (मल रहित) मन्त्रों से हवन करने से हवन करने वाला पाप रहित हो जाता है, शिवजी के अनुग्रह को प्राप्त होकर ज्ञानवान् हो जाता है।

फिर गोबर लाकर उसका पिण्ड करके मन्त्र पढ़कर, सूंघकर उसे अग्नि में रखकर, उस दिन व्रत्ती हविष्य अन्न खाये। फिर प्रातःकाल चतुर्दशी के दिन सब पहले दिन का कृत्य करके उस दिन निराहार रहकर शेष समय व्यतीत करे। फिर पर्व के दिन यह सब कृत्य करके होम के पीछे रुद्राग्नि को शान्त करके यत्न पूर्वक भस्म ग्रहण करे फिर जटा युक्त व मुण्डित व केवल शिखामात्र धारण किये हुए स्नान करके, अथवा काषाय वस्त्र व चर्म चीर वस्त्र धारण करे, एक वस्त्र धारण करे, वल्कल व मेखला दण्ड धारण किये रहे फिर चरण धोकर दो बार आचमन करके अपने शरीर को उस हवन की भस्म से भूषित करे। ‘अग्निरितिभस्म’ यह छः अथर्ववेद के मन्त्र हैं, इनसे सिर से लेकर चरण तक स्पर्श करे फिर इसी क्रम से सर्वांग में भस्म लगावे ओंकार युक्त शिवजी का उच्चारण करें। फिर ‘त्र्यायुषं जमदग्नेः’ इस मन्त्र से त्रिपुण्ड लगावे, इस प्रकार शिवभाव को प्राप्त होकर शिवयोग का आचरण करे। तीनों सन्ध्याओं में इस पाशुपत व्रत को करे।

यह भुक्ति-मुक्ति का देनेवाला पशुत्य दूर करता है। इस पाशुपत व्रत से पशुपन त्याग करे, लिंगमूर्ति सनातन महादेवजी का पूजन करे। आठ दलों का सुवर्ण का कमल, नौ रत्नों से अलंकृत करके कर्णिका और केशर के सहित पद्मासन की कल्पना करे। यह ऐश्वर्य होने पर करे तथा इसके अभाव में लाल, श्वेत कमल स्थित करे, यदि यह भी न हो एके तो केवल भावना का कमल स्थित करे उस कमल की कर्णिका में स्फटिक एक छोटी लिंगमूर्ति स्फटिक की क्रम से पूजन करें। उस लिंग को विधि पूर्वक स्थापन कर और शुद्ध कर पंचमुख के प्रकार से आसन मूर्ति को कल्पना करके पंचगव्यादि पवित्र विस्तार पूर्वक यथायोग्य सहस्त्र कलशों से स्नान करावे। गन्ध, द्रव्य, कपूर, चन्दनादि, कुंकुम यह सब वस्तु वेदी सहित लिंग को चढ़ाकर भूषण से भूषित करे। बिल्वपत्र, श्वेतपद्म, रक्तपद्म, नीलकमल तथा दूसरे सुगन्धित पुष्प पवित्र श्रेष्ठ बिल्वपत्र, चित्रदूर्वा, अक्षत, महापूजा के विधान से यथा लाभ पूजित करके धूप, दीप, अर्घ्य, नैवेद्य प्रदान करे।

इस प्रकार शिवजी को निवेदन करके कल्याण की प्रवृत्ति करे और जो न्याय पूर्वक उपार्जन की हुई अपने कोई इष्ट वस्तु हों, वह सब द्रव्य इस व्रत में विशेष कर देने चाहिए। श्रीपत्र, उत्पल और कमल सहस्त्र चढ़ाने चाहिए अथवा कम से कम संख्या 108 चढ़ाने चाहिये। उसमें भी विशेष कर बेलपत्र को न त्यागे एक ही सुवर्ण का कमल सहस्त्र कमलों से विशेष है और नीलोत्पलादि कमल बेलपत्र के समान हैं और दूसरे फूलों में नियम नहीं है। यथालाभ निवेदन करे अष्टांग अर्घ्य श्रेष्ठ है, विशेष कर धूप देनी, चन्दन लगाना, कृष्ण, अगरु, अघोर नामक मुख में, सद्योजात में, मनशिला, वामदेव मुख में, चन्दन, पौरुष में, हरिताल ईशान में, भस्म इस प्रकार कोई आचार्य आलेपन कहते हैं, कोई धूपान्तर के विधान से धूप नहीं मानते हैं कि अघोर के मुख में श्वेत अगरु, पुरुष के मुख में काला अगरु, सद्योजात के मुख में गुग्गुल या सौम्य के मुख में सुगन्धि द्रव्य, ईशान में उशीरादि की धूप विशेष करके देनी चाहिये। शर्करा, मधु, कंपूर, कपिला गौ के घृत में मिलाकर देनी चाहिए।

चन्दन, अगरु काष्ठादि यह सामान्य कहा है कर्पूर वर्ति घी के दीपक देने चाहिये। इसके उपरान्त प्रत्येक मुख की ओर अर्घ्य और आचमन देना चाहिये। प्रथम आवरण से क्रम से गणेश और कार्तिकेय का पूजन करना चाहिये। फिर ब्रह्मा प्रभृति अंगादि का पूजन करे। इस प्रकार प्रथम आवरण की पूजा करने पर दूसरे आवरण में चक्रवर्ती विघ्नेश की पूजा करनी चाहिये। तीसरे आवरण में भव आदि अष्टमूर्तियों का पूजन करना चाहिये। चौथे आवरण में महादेवादियों की तथा ग्यारह रुद्रों की, सब गणेश्वरों की पूजा करनी चाहिये। पद्म के बाहर पांच आवरण के क्रम से अस्त्र और अनुचरों के साथ दश दिक्यालों की पूजा करनी न्वाहिये। ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र और सब ग्रह, समस्त देव-देवी और सर्व आकाशचारी सब पातालवासी और सब मुनीश्वर, सब मुख्य योगीश्वर, पांचवें आवरण में मातृकाओं के साथ पूजे गणों के सहित क्षेत्रपाल और यह सब चराचर जगत् शिवजी की प्रीति से शिवजी की विभूति जानकर पूजे।

आवरण पूजा के अन्त में परमेश्वर को पूजन करके घृत व्यंजन युक्त हवि शाकादि मनोहर वस्तु निवेदन करें। मुख सुगन्धि के निमित्त ताम्बूल रोचक द्रव्य के सहित दे, फिर अनेक प्रकार के पुष्य और भूषणों से अलंकृत करके नीराजन (आरती) के अन्त में पूजा का विस्तार समाप्त करे, फिर सामग्री सहित पानपात्र दे और शयन निवेदन करे। चन्द्रमा के समान हार शयन स्थान में रखे और भी सब योग्य पदार्थ राजाओं के समान स्थित करे। यह कार्य स्वयं करे या ऋत्विजों से कराकर हवन और पूजन के पीछे प्रार्थना, स्तोत्र, जप करके पंचाक्षर विद्या को जपे, प्रदक्षिणा करे और परमात्मा की पूजा करे, फिर शिवजी के सम्मुख ही गुरु, ब्राह्मणों का पूजन करे फिर अर्घ्य और आठ फूल देकर देव को लिंग से विसर्जन करके अग्निमन्त्र से अग्नि की रक्षा करके उसे भी विदा करे।

इस प्रकार से यह सब कृत्य प्रतिदिन करे, फिर सब सामग्री सहित कमल युक्त लिंग अपने गुरु को दे दे अथवा शिवालय में स्थापन करे, फिर वह व्रती अपने दूसरे गुरुजनों का पूजन करके समर्थ हो तो भक्त, ब्राह्मण और दीनों को सन्तुष्ट करे। आप या तो भोजन न करे, अथवा फल, मूल भोजन करे। दूध पीवे वा भिक्षा खाय, केवल एक बार भोजन करे, रात्रि में सदा नियत भोजन करे और पवित्र होकर पृथ्वी पर शयन करे। भस्म वा तृण पर शयन करे अथवा चीर वा अजिन मृगचर्म पर शयन करे। ब्रह्मचर्य पूर्वक इस व्रत को समाप्त करे। रविवार आदी नक्षत्र के दिन अमावस, पूर्णमासी, अष्टमी और चतुर्दशी को सामर्थ्य हो तो उपवास करे। पाखण्ड, पतित, उदक्या, रजस्वला, सूतिका आदि अपवित्रों को मन से भी स्मरण न करे, न वाणी से उच्चारण करे। क्षमा, दान, दया, सत्य, अहिंसा और शील युक्त सदा रहे। सन्तुष्ट, शान्त और तप तथा ध्यान में सदा मन लगावे। तीनों काल स्नान करे अथवा भस्मस्नान करे। मन, वचन, क्रम से विशेष पूजा करे बहुत कहने से क्या ? व्रती कुछ भी अमंगल बात न करे। प्रमाद हो जाने से आचार में गुरु-लघु का विचार करके पूजा, होम, यज्ञादि से उसका उचित प्रायश्चित्त करे।

जब तक व्रत समाप्त न हो, कुछ भी प्रमाद न करे। गोदान, वृषोत्सर्ग, पूजा धन के अनुसार सब कामना से रहित होकर भक्त शिवजी की प्रीति के निमित्त सब करे। यह व्रत की विधि संक्षेप से सामान्य कही है। प्रति मास में जो विशेष है, सो क्रम से कहता हूँ वैशाख में हीरे का लिंग, आषाढ़ में मोती का, श्रावण में नीलम का, भाद्रपद में पद्मराग मणि का, आश्विन में गोमेद का, कार्तिक में मूंगे का, अगहन में वैडूर्य का, पौष में पुष्पराग का, माघ में द्युमणि (सूर्यकान्त) का, फाल्गुन में चन्द्रकान्त मणि का, चैत्र में भी इसी मणि का अथवा रत्न न मिले तो सब महीनों में सुवर्ण लिंग की पूजा करे। उसके अभाव में चांदी, तांबा अथवा शिला के लिंग का पूजन करे, यह भी न हो तो मिट्टी का या किसी वस्तु का लिंग पूजे। सब ही मूर्ति गन्धमय बनावे अथवा जैसी रुचि होवे सो बनावे।

व्रत के अन्त में अपना नित्यकर्म समाप्त करके विशेष पूजा और हवन करके सदाचरण युक्त व्रती पुरुष शिव और आचार्य का विशेष पूजन करके आचार्य की आज्ञा से पूर्व व उत्तर मुख होकर बैठे। कुश का आसन कुशा ही हाथ में लिये प्राण अपान वायु को रोककर शक्ति के अनुसार मूलमन्त्र को जपकर उमा सहित त्रयम्बक देव का ध्यान करके आज्ञा लेकर हाथ जोड़कर कहे हे भगवन! आपकी आज्ञा से अब इस व्रत का त्याग करता हूँ, यह कहकर लिंगमूल के कुशों को उत्तर भाग से विसर्जन करे फिर दण्ड, जटा, चीर, मेखला को भी त्याग करे, फिर विधि पूर्वक आचमन करके पंचाक्षर मन्त्र का उच्चारण करे। जो देहान्त तक इस दीक्षा को सावधानी से करता है और इस व्रत को करता है, वह नैष्ठिक व्रती कहलाता है। वही सब आश्रमों में श्रेष्ठ महापाशुपत व्रती कहलाता है। वही तपस्वियों में श्रेष्ठ और महाव्रती है। उसके समान मुमुक्षुओं में कोई कृतकृत्य नहीं है, जो यति नैष्ठिक हो, वह उत्तम नैष्ठिक है।

जो बारह दिन तक भोजन न करके इस व्रत को करे वह भी तीव्र व्रत के कारण नैष्ठिक के तुल्य हो जाता है। जो घृत शरीर में लगाकर इस व्रत को करता है, दो-तीन दिन भी करता है, वह भी नैष्ठिक है। जो कोई निष्काम होकर इस व्रत को करता है और जिसने निरन्तर अपनी आत्मा शिवजी को अर्पण की है, उसके समान कोई दूसरा नहीं है। विद्वान् ब्राह्मण भस्म लगाकर महापाप से उत्पन्न हुए पापों से शीघ्र छूट जाता है, इसमें सन्देह नहीं। रुद्र अग्नि का जो परम वीर्य है, वही भस्म कहलाता है, इस कारण सब काल में भस्म युक्त वीर्यवान् होता है। जो पुरुष भस्मनिष्ठ हैं, अग्नि के संगम से उनके सब दोष दूर हो जाते हैं, भस्मस्नान से पवित्र हुआ पुरुष भस्मनिष्ठ कहा जाता है।

जिसके शरीर में भस्म लगा है और जिसका त्रिपुण्ड्र भस्म से दीप्तिमान् है, भस्मस्नान करने से यह पुरुष भस्मनिष्ठ कहा जाता है। भूत, प्रेत, पिशाच और बड़े-बड़े भयंकर रोग भस्मनिष्ठ के समीप से दूर भाग जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं। कल्मष (पाप) दूर करने से और भासमान होने से यह भस्म कहलाता है, वह विभूति पुरुषों को ऐश्वर्य देनेवाली तथा परम रक्षा करने वाली है। अधिक भस्म का माहात्म्य क्या कहे ? व्रती भस्मस्नान करके स्वयं महैश्वर हो जाता है। यही भस्म परमेश्वरी और शैवों का परम अस्त्र है, इसने उपमन्यु की तप में आपदा निवारण की है। इस कारण सब प्रकार के यत्न से “पाशुपत व्रत” करना चाहिये, धन के समान भस्म का संग्रह करना चाहिये और भस्मस्नान में प्रीति करनी चाहिए।

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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