Vat Savitri Vrat Katha: वट सावित्री व्रत के दिन पूजा के समय जरूर सुनें ये कथा, सुखी रहेगा वैवाहिक जीवन!

Vat Savitri Vrat Puja: अगर महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में परेशानियों का सामना कर रही हैं तो वट सावित्री व्रत के दिन पूजा के समय ये कथा अवश्य सुनें। इस कथा के सुनने से व्रत सफल होता है और वैवाहिक जीवन भी सुखमय हो जाता है।

Vat Savitri Vrat Katha

Vat Savitri Vrat Katha: हिन्दू धर्म में वट सावित्री व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए रखा जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या (कुछ क्षेत्रों में पूर्णिमा) को रखा जाता है। इस दिन महिलाएं बरगद (वट) के पेड़ की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं, क्योंकि सावित्री की तपस्या, बुद्धि और दृढ़ संकल्प के कारण सत्यवान को पुनः जीवन मिला था। इसलिए यह व्रत वैवाहिक प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है और बरगद का पेड़ लंबी आयु और स्थिरता का प्रतीक है, क्योंकि इसमें त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का वास होता है।

वट सावित्री व्रत कथा

प्राचीन समय में मद्र देश में एक बहुत ही न्यायप्रिय और ज्ञानी राजा राज्य करता था। उसका नाम अश्वपति था। राजा अश्वपति बहुत धर्मपरायण थे और हमेशा अपने राज्य और प्रजा की भलाई के लिए काम करते थे। उनके जीवन में एक दुख था कि उनके कोई संतान नहीं थी। इस कारण वे बहुत चिंतित रहते थे। संतान प्राप्ति की इच्छा से राजा अश्वपति ने अपनी रानी के साथ मिलकर देवी सावित्री की कठोर पूजा और व्रत किया। उन्होंने पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ देवी की आराधना की। उनकी भक्ति और तपस्या से देवी प्रसन्न हुईं और उन्होंने राजा को वरदान दिया कि उनके घर एक तेजस्वी और सभी गुणों से सम्पन्न कन्या का जन्म होगा।

कुछ समय बाद राजा अश्वपति के घर एक सुंदर और दिव्य कन्या का जन्म हुआ। उसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री बचपन से ही बहुत बुद्धिमान, संस्कारी और धर्मपरायण थी। वह सभी से आदर से बात करती थी और सभी गुणों से परिपूर्ण थी। उसकी सुंदरता और बुद्धिमत्ता की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। जब सावित्री विवाह योग्य हुई, तब राजा अश्वपति ने उसे कहा कि वह अपना वर स्वयं चुन सकती है। यह सुनकर सावित्री ने अपने लिए योग्य वर खोजने का निर्णय लिया और वह अपने साथ कुछ लोगों को लेकर विभिन्न स्थानों पर गई।

एक दिन सावित्री ऐसे स्थान पर पहुंची जहां राजा द्युमत्सेन रहते थे। वे पहले एक बड़े राजा थे, लेकिन उनका राज्य छिन गया था। अब वे अपनी पत्नी और पुत्र के साथ जंगल में रहते थे। उनके पुत्र का नाम सत्यवान था। सत्यवान बहुत ही धर्मात्मा, सरल स्वभाव वाला और सत्य का पालन करने वाला युवक था। सावित्री ने सत्यवान को देखा और तुरंत ही उसे अपने पति के रूप में चुन लिया। वह वापस अपने पिता के पास लौट आई। उस समय वहां महर्षि नारद भी उपस्थित थे। नारद जी ने सावित्री के चुनाव को ध्यान से सुना। उन्होंने सत्यवान की कुंडली देखकर राजा अश्वपति से कहा कि सत्यवान बहुत अच्छे गुणों वाला है, लेकिन उसके जीवन की एक बड़ी समस्या है। वह बहुत अल्पायु है। उसके जीवन में केवल एक वर्ष ही शेष है, उसके बाद उसकी मृत्यु निश्चित है।

यह सुनकर राजा अश्वपति बहुत दुखी हुए और उन्होंने सावित्री से कहा कि वह अपना निर्णय बदल ले और किसी अन्य योग्य वर का चुनाव करे, लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही। उसने कहा कि आर्य कन्याएं अपने जीवन में एक ही बार पति का चुनाव करती हैं। उसने कहा कि उसने सत्यवान को अपने मन से स्वीकार कर लिया है और अब वह किसी और से विवाह नहीं करेगी, चाहे उसका जीवन छोटा हो या बड़ा। सावित्री के दृढ़ निश्चय और धर्म के प्रति उसकी आस्था को देखकर राजा अश्वपति ने उसका विवाह सत्यवान से कर दिया।

विवाह के बाद सावित्री अपने पति सत्यवान और सास-ससुर के साथ जंगल में रहने लगी। वह अपने सास-ससुर की सेवा करती थी और अपने पति का पूरा ध्यान रखती थी। वह बहुत ही शांत और धैर्यवान जीवन जी रही थी। समय धीरे-धीरे बीतने लगा। सावित्री को महर्षि नारद की बात हमेशा याद रहती थी कि सत्यवान के जीवन के केवल एक वर्ष शेष हैं। जैसे-जैसे समय नजदीक आता गया, सावित्री ने अपने मन को भगवान की भक्ति में और अधिक लगा दिया। अंततः वह दिन आ गया जब सत्यवान के जीवन का अंतिम समय निकट था। उस दिन सावित्री ने व्रत रखा और पूरे नियम से पूजा की। वह अपने सास-ससुर से अनुमति लेकर अपने पति के साथ जंगल चली गई। सत्यवान लकड़ी काटने के लिए पेड़ पर चढ़ा गया।

कुछ ही देर बाद अचानक सत्यवान के सिर में बहुत तेज दर्द होने लगा। वह असहनीय पीड़ा के कारण पेड़ से नीचे उतर आया और बेहोश होकर गिर पड़ा। सावित्री बहुत घबरा गई। उसने अपने पति का सिर अपनी गोद में रखा और उसे होश में लाने की कोशिश करने लगी। तभी उसने देखा कि दक्षिण दिशा से एक दिव्य पुरुष आ रहे हैं। वह यमराज थे, जो मृत्यु के देवता हैं। यमराज अपने दूतों के साथ सत्यवान के प्राण लेने आए थे। यमराज ने सत्यवान के शरीर से उसके प्राण निकाल लिए और उसे लेकर चलने लगे। यह देखकर सावित्री उनके पीछे चल पड़ी। यमराज ने उसे रोका और वापस जाने को कहा, लेकिन सावित्री ने कहा कि एक पत्नी का धर्म है कि वह अपने पति का साथ कभी न छोड़े। उसने कहा कि वह अपने पति के बिना नहीं रह सकती।

सावित्री के धर्मयुक्त वचनों से प्रसन्न होकर यमराज ने उससे उसके पति के प्राणों के अतिरिक्त कोई भी वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने यमराज से अपने सास-ससुर की आंखों की खोई हुई ज्योति तथा दीर्घायु मांग ली। यमराज “तथास्तु” कहकर आगे बढ़ गए। फिर भी सावित्री ने यमराज का पीछा नहीं छोड़ा। यमराज ने उसे फिर वापस जाने के लिए कहा। इस पर सावित्री ने कहा कि हे धर्मराज! मुझे अपने पति के पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं हैं। पति के बिना नारी जीवन की कोई सार्थकता नहीं है। हम पति-पत्नि भिन्न-भिन्न मार्ग कैसे जा सकते है। पति का अनुगमन मेरा कर्तव्य है।

यमराज ने सावित्री के पतिव्रत धर्म की निष्ठा देख कर पुनः वर मांगने के लिए कहा सावित्री ने अपने सास-ससुर के खोए हुए राज्य की प्राप्ति तथा सौ भाइयों की बहन होने का वर मांगा। यमराज पुनः “तथास्तु” कहकर आगे बढ़ गए। परन्तु सावित्री अब भी यमराज का पीछा किए जा रही थी। यमराज ने फिर से उसे वापस लौट जाने को कहा, किंतु सावित्री अपने प्रण पर अडिग रही। तब यमराज ने कहा कि हे देवी! यदि तुम्हारे मन में अब भी कोई कामना है तो कहो जो मांगोगी वही मिलेगा। इस पर सावित्री ने कहा कि यदि आप सच में मुझ पर प्रसन्न हैं और सच्चे हृदय से वरदान देना चाहते है तो मुझे सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान दें।

यमराज ने “तथास्तु” कह दिया, लेकिन जब यमराज आगे बढ़ने लगे, तब सावित्री ने कहा कि यह वरदान कैसे पूरा होगा जब उसके पति ही जीवित नहीं हैं। बिना पति के वह मां कैसे बन सकती है? यह सुनकर यमराज समझ गए कि सावित्री बहुत बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ है। वह उसे छल से नहीं रोक सकती थी। अंत में यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस कर दिए और उसे जीवनदान दे दिया। सावित्री ने प्रणाम करके जैसे ही वट वृक्ष की परिक्रमा पूर्ण की वैसे ही सत्यवान के मृत शरीर जीवित हो उठा। सावित्री का पतिव्रत धर्म सफल हुआ। सत्यवान जीवित हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने घर लौट आए।

प्रसन्न होकर सावित्री अपने पति सहित सास-ससुर के पास गई। उनकी नेत्र ज्योति वापस लौट आई थी। उनके मंत्री उन्हे खोज चुके थे। द्युमत्सेन ने पुनः अपना राज सिंहासन संभाल लिया था। उधर महाराज अश्वसेन सौ पुत्रों के पिता हुए और सावित्री सौ भाइयों की बहन। यमराज के वरदान से सावित्री सौ पुत्रों की मां बनी। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रत का पालन करते हुए अपने पति के कुल एवं पितृकुल दोनों का कल्याण कर दिया। सावित्री की बुद्धिमानी, भक्ति और पतिव्रत धर्म की चर्चा पूरे संसार में फैल गई। उसे एक आदर्श पत्नी के रूप में हमेशा याद किया जाने लगा। इस प्रकार सावित्री ने अपने साहस, धैर्य और धर्म के बल पर अपने पति का जीवन वापस प्राप्त किया और अपने परिवार को सुख और सम्मान दिलाया।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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